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सोमवार, 1 अगस्त 2016

अजमेर,राजस्थान लोक सेवा आयोग को राष्ट्रीय अवार्ड आई टी क्षैत्र मे उल्लेखनीय कार्य हेतु सम्मानित किया

अजमेर,राजस्थान लोक सेवा आयोग को राष्ट्रीय अवार्ड आई टी क्षैत्र मे उल्लेखनीय कार्य हेतु सम्मानित किया

अजमेर, एक अगस्त। राजस्थान लोक सेवा आयोग को आई टी क्षैत्र मे उल्लेखनीय कार्य कर देष मे नई पहचान स्थापित करने के लिए राष्ट्रीय अवार्ड से सम्मानित किया गया है।
केन्द्रीय इस्पात राज्य मंत्री श्री विष्णुदेव साई ने नई दिल्ली मे आयोजित एक समारोह मे यह अवार्ड ष्बेस्ट प्रोजेक्ट इन स्मार्ट गर्वनेन्सष् के लिये दिया गया। आयोग की ओर से यह अवार्ड  श्री मोहित षर्मा  प्रोग्रामर, ने प्राप्त किया।
उल्लेखनीय है की राजस्थान लोक सेवा आयोग द्वारा आर.ए.एस 2013 की मुख्य परीक्षा की उत्तर पुस्तिकाओ की ष्आॅन-स्क्रीन मार्किंगष् कराकर आई टी क्षैत्र मे अभूतपूर्व कार्य करने के फलस्वरूप यह राष्ट्रीय अवार्ड दिया गया। राजस्थान लोक सेवा आयोग देष का एकमात्र आयोग है जिसके द्वारा सर्वप्रथम ष्आॅन-स्क्रीन मार्किंगष् सिस्टम से उत्तर पुस्तिकाओ की जाँच कराई गई है। इसी के परिणामस्वरूप 62 दिन के रिकार्ड समय मे आर.ए.एस 2013 मुख्य परीक्षा का परिणाम घोषित किया गया।
राजस्थान लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष डाॅ ललित के पंवार ने इस राष्ट्रीय अवार्ड के लिये आयोग परिवार को बधाई दी है।






रविवार, 6 अक्तूबर 2013

बाडमेर भारत-पाक सरहद वीरातरा माता का मंदिर





बाडमेर भारत-पाक सरहद पर वीरातरा स्थित वीरातरा माता का मंदिर सैकड़ों वषोंर से आस्था का केन्द्र बना हुआ है। यहां प्रति वर्ष चैत्र,भादवा एवं माघ माह की शुक्ल पक्ष की तेरस एवं चौदस को मेला लगता है। अखंड दीपक की रोशनी,नगाड़ों की आवाज के बीच जब जनमानस नारियल जोत पर रखते है तो एक नई रोशनी रेगिस्तान के वीरान इलो में चमक उठती है। 
वीरातरा माता की प्रतिमा प्रकट होने के पीछे कई दंतकथाएं प्रचलित है। एक दंतकथा के
 मुताबिक प्रतिमा को पहाड़ी स्थित मंदिर से लाकर स्थापित किया गया। अधिकांश जनमानस एवं प्राचीन इतिहास से संबंध रखने वाले लोगों का कहना है कि यह प्रतिमा एक भीषण पाषाण टूटने से प्रकट हुई थी। यह पाषाण आज भी मूल मंदिर के  बाहर दो टूकड़ों में विद्यमान है। वीरातरा माता की प्रकट प्रतिमा से एक कहानी यह भी जुड़ी हुई है कि पहाड़ी स्थित वीरातरा माताजी के  प्रति लोगों की अपार श्रद्घा थी। कठिन पहाड़ी चढ़ाई, दुर्गम मार्ग एवं जंगली जानवरों के  भय के बावजूद श्रद्घालु दर्शन करने मंदिर जरूर जाते थे। इसी आस्था की वजह से एक 80 वर्षीय वृद्घा माताजी के  दर्शन करने को पहाड़ी के ऊपर चढ़ने के लिए आई। लेकिन वृद्घावस्था के कारण ऊपर चढ़ने में असमर्थ रही। वह लाचार होकर पहाड़ी की पगडंडी पर बैठ गई। वहां उसने माताजी का स्मरण करते हुए कहा कि वह दर्शनार्थ आई थी। मगर शरीर से लाचार होने की वजह से दर्शन नहीं कर पा रही है। उसे जैसे कई अन्य भक्त भी दर्शनों को लालायित होने के बाद दर्शन नहीं कर पाते। अगर माताजी का ख्याल रखती है तो नीचे तलहटी पर आकर छोटे बच्चों एवं वृद्घों को दर्शन दें। उस वृद्घा की इच्छा के  आगे माताजी पहाड़ी से नीचे आकर बस गई। वीरातरा माताजी जब पहाड़ी से नीचे की तरफ आई तो जोर का भूंप आया। साथ ही एक बड़ा पाषाण पहाड़ी से लुढ़कता हुआ मैदान में आ गिरा। पाषाण दो हिस्सों में टूटने से जगदम्बे माता की प्रतिमा प्रकट हुई। इसे बाद चबूतरा बनाकर उस पर प्रतिमा स्थापित की गई। सर्वप्रथम उस वृद्ध महिला ने माताजी को नारियल चढ़ाकर मनोकामना मांगी। 
प्रतिमा स्थापना के बाद इस धार्मिक स्थान की देखभाल भीयड़ नामक भोपा करने लगा। भीयड़ अधिकांश समय भ्रमण कर माताजी के चमत्कारों की चर्चा करता। माताजी ने भीयड़ पर आए संकटों को कई बार टाला। एक रावल भाटियों ने इस इलो में घुसकर पशुओं को चुराने एवं वृक्षों को नष्ट करने का प्रयत्न किया। भाटियों की इस तरह की हरकतों को देखकर भोपों ने निवेदन किया कि आप लोग रक्षक है। ऐसा कार्य न करें, मगर भाटियों ने इसकी तरफ ध्यान नहीं दिया। उल्टे भोपों को परेशान करना प्रारंभ कर दिया। लाचार एवं दुखी भोपे भीयड़ के  पास आए। भीयड़ ने भी भाटियों से प्रार्थना की। इसे बदले तिरस्कार मिला। अपनी मर्यादा और इलाके  के नुकसान को देखकर वह बेहद दुःखी हुआ। उसने वीरातरा माता से प्रार्थना की। माता ने अपने भक्त की प्रार्थना तत्काल सुनते हुए भाटियों को सेंत दिया कि वे ऐसा नहीं करें। मगर जिद्द में आए भाटी मानने को तैयार नहीं हुए। इस पर उनकी आंखों से ज्योति जाने लगी। शरीर में नाना प्रकार की पीड़ा होने लगी। लाचार भाटियों ने क्षमास्वरूप माताजी का स्मरण किया और अपनी करतूतों की माफी मांगी। अपने पाप का प्रायश्चित करने पर वीरातरा माताजी ने इन्हें माफ किया। भाटियों ने छह मील की सीमा में बारह स्थानों का निर्माण करवाया। आज भी रोईडे का थान,तलेटी का थान, बेर का थान, तोरणिये का थान, मठी का थान,ढ़ोक का थान, धोरी मठ वीरातरा, खिमल डेरो का थान, भीयड़ भोपे का थान, नव तोरणिये का थान एवं बांकल का थान के  नाम से प्रसिद्ध है। वीरातरा माताजी की यात्रा तभी सफल मानी जाती है जब इन सभी थानों की यात्रा कर दर्शन किए जाते है। 
चमत्कारों की वजह से कुल देवी मानने वाली महिलाएं न तो गूगरों वाले गहने पहनती है और न ही चुड़ला। जबकि इन इलो में आमतौर पर अन्य जाति की महिलाएं इन दोनों वस्तुओं का अनिवार्य रूप से उपयोग करती है। वीरातरा माता के  दर्शनार्थ बंगाल, बिहार, महाराष्ट्र, गुजरात समेत कई प्रांतों के  श्रद्घालु यहां आते हैं।

सोमवार, 18 मार्च 2013

ईलोजी फिर सज रहे हैं दूल्हे के वेश में


ईलोजी फिर सज रहे हैं दूल्हे के वेश में 

लोक आस्था और विश्वास से सम्मानित ईलोजी (नाथूरामजी) को रिझाने की कोशिश, चटख रंगों से हो रहा है शृंगार। होली से पहले होती है विशेष पूजा व आरती, आस्था के साथ हास-परिहास और होली की मस्ती भरे कहानी-किस्सों व गायन के दौर चलेंगे अब शहर में कई जगह 



 पाली



होली के लोकदेवता के तौर पर सम्मानित ईलोजी (नाथूरामजी) को रिझाने की कोशिश इन दिनों परवान चढ़ रही है। स्थानीय मौलिक मान्यताओं के अनुसार इनकी प्रतिमाओं को दूल्हे के गेटअप में सजाया जा रहा है। घी का झंडा और जर्दा बाजार स्थित इनके मंदिरों को निखारने में कई हुनरमंद हाथ जुट गए हैं। पटवा बाजार में मुख्य मार्ग पर विराजित करने के लिए कई साल पहले तैयार ईलोजी की प्रतिकृति की भी सार-संभाल की जा रही है। लोक आस्था और श्रद्धा के प्रतीक ईलोजी के शृंगार की शुरुआत इनके पाग की सजावट से होती है। इस पर तुर्रा व किलंगी भी लगाए जाएंगे। विराजित मुद्रा में स्थित इन भव्य प्रतिमाओं के बटनदार कोट व जामा को बेल-बूटों से डिजाइनर बनाया जा रहा है।



कानों में मोतियों की झूलती बालियां सजाई जाएंगी। हाथों में सिंह की मुखाकृति वाले ब्रेसलेट, पांवों में कड़े तथा गले में सुनहरी कंठी व नगीना जड़ी चेन से अलंकृत कर इनकी संपन्नता को दर्शाया जाएगा।

प्राकृतिक रंगों से सजते थे अतीत में : अतीत में यह शृंगार पूरी तौर पर प्राकृतिक रंगों से होता था। बरसों से इनके शृंगार से जुड़े रहे नैना भाई बताते हैं कि जंगाल, हिंगलू व पेवड़ी को सरेस के साथ उबालकर, बॉडी-कलर तैयार करते थे। माटी के बड़े दीपक में बारह अलग-अलग रंगों का घोल बनाकर ईलोजी के कोट व जामे को डिजाइनर बनाया जाता। माणक भाई बताते हैं कि फाल्गुन सुदी ग्यारस से ईलोजी की एक प्रतिकृति, पटवा बाजार में विराजित करने की भी पुरानी परंपरा है। पूरी श्रद्धा के साथ गोर-किनारी लगे इनके शृंगार आभूषणों को निखारा जा रहा है।

धूम धड़ाका पाटोत्सव का :इनके पाटोत्सव की तैयारियां भी शुरू हो गई हैं। इनके विधि-विधान पूर्वक फाल्गुन सुदी ग्यारस को तणी बांधने के साथ ही पाट बिठाया जाएगा। तब से आगामी सप्ताह भर तक इनकी गूगल धूप आरती होगी व झांझर, चंग-नगाड़े की सरगम पर लोकगीतों से इनका दरबार सजेगा। भैरुनाथ सेवा समिति के गौतम बाफना व केवलचंद तलेसरा ने बताया कि मनौतियों के कई रूप देखने को मिलते हैं, इन दिनों व्यापार में श्रीवृद्धि की कामना भी इनसे की जाती है।

परंपराएं जुड़ती हैं

मनौतियों को पूरा करने तथा धन धान्य भरी संपन्नता देने वाले के रूप में पूजे जाते हैं, ईलोजी होलिका से रिश्ता तय होने व बटुकनाथ अवतारी के किस्से बचपन से सुने हैं। कई समाजों के नव-दंपती को खुशहाल जीवन के लिए संयुक्त दर्शन (बोलचाल में जात लगाना) करते भी देखा है। पारंपरिक विश्वास से जुड़े हुए हैं ये।

-नैना भाई,

चलो ऐ सहेल्यां आपां भैरू ने मनावां, इनके सम्मान में गाया जाने वाला लोकप्रिय गीत है। इसमें शृंगार पक्ष को भी बताया गया है।

भैरू कालो भैरू गोरों भैरू संग मतवालो ऐ।

हाथ में सोना रो चिटियो तुर्रा किलंगी वाले ऐ।।

ठहाके व मस्ती : हंसी-ठिठोली और विनोद भी बहुत होता है इन्हें लेकर। शंकर भासा बताते हैं कि शहर के कई नामी-गिरामी डॉक्टरों को नगर सेठ का स्वास्थ्य खराब होने के बहाने यहां ला चुके हैं। दरअसल डॉक्टर साहब के घर जाकर विनती की जाती कि सेठ जी बीमार हो गए हैं। आप तुरंत साथ चलिए। डॉक्टर साहब का साथ होने पर, इन्हें लेकर यहां पहुंच जाते। फिर ठहाकों से कहते, ये ही हैं सेठ जी। और डॉक्टर साहब भी ठहाकों में शामिल हो जाते। ऐसे ही कई हास-परिहास के किस्से जुड़े हैं ईलोजी के साथ।

होलिका से विवाह नहीं हुआ तो आजीवन कुंवारे रहे ईलोजी!

जन श्रुतियों के अनुसार हिरण्यकश्यप की पुत्री होलिका का रिश्ता ईलोजी से तय हुआ था। फाल्गुन शुक्ला पूर्णिमा को उनका विवाह निश्चित हुआ था। वे बारात लेकर ससुराल पहुंचे मगर बारात के मंडप तक पहुंचने से पहले ही होलिका-दहन हो गया। ईलोजी को यह सूचा मिलने पर वे हतप्रभ हो गए। शेष जीवन कुंवारे ही रहते हुए नगर सेवा को समर्पित रहे। - अर्जुनसिंह शेखावत, शिक्षाविद्

नगर रक्षक के रूप में पूजे जाते हैं

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार ईलोजी को नगर रक्षक-क्षेत्रपाल माना जाता है। प्रचलित कथा को आधार मानें तो पार्वती की कालका से रक्षा के लिए महादेव ने बटुकनाथ-भैरूनाथ का रूप लिया था। तब विष्णु ने प्रसन्न होकर महादेव को नगर रक्षक के रूप में पूजे जाने का वरदान दिया था। संभवत: ईलोजी वे ही वरदानित रूप हैं। - पं.अश्विन दवे, ज्योतिषी

रविवार, 2 दिसंबर 2012

सर क्रीक सीमा पर पानी में बाड़ लगाएगा भारत





भारत जल्द ही पाकिस्तान के साथ लगे विवादित सर क्रीक सीमा क्षेत्र में पानी के भीतर बाड़ लगाएगा जो पानी में ही डूबे तारों के सहारे टिकी होगी। कच्छ के रण के दलदली क्षेत्र में 96 किलोमीटर की पट्टी अवैध रूप से सीमापार की गतिविधियों के लिहाज से संवेदनशील है और बीएसएफ के समुद्री कमांडो हर समय यहां हथियारों और मादक पदार्थों की तस्करी पर नजर रखते हैं।

परियोजना से जुड़े शीर्ष सूत्रों ने कहा कि केंद्रीय गृह मंत्रालय ने अनेक विकल्पों पर विचार करने के बाद क्षेत्र में हर मौसम के लिए जालनुमा तारों के बॉक्स (गैबियन बॉक्स) लगाने का काम केंद्रीय लोक निर्माण विभाग (सीपीडब्ल्यूडी) और राष्ट्रीय भवन निर्माण निगम (एनबीसीसी) को सौंपा है। सूत्रों के अनुसार करीब 75 किलोमीटर जलीय क्षेत्र में एनबीसीसी बाड़ लगाएगा और केंद्रीय लोक निर्माण विभाग ने शेष इलाके में काम शुरू कर दिया है। ‘गैबियन बॉक्स’ में बड़े पत्थरों को भरकर जलीय क्षेत्र में तली में लगाया जाएगा।

इस मामले से जुड़े एक अधिकारी ने कहा कि गैबियन बॉक्सों पर बाड़ लगाई जाएगी जिसमें आमतौर पर सभी मौसम में लगने वाले घुमावदार तार और खंभे होंगे। द सर क्रीक क्षेत्र में दलदली जलीय क्षेत्र है और गैबिनय बॉक्स इस भूभाग की कठिनाई के मद्देनजर बेहतर तरीके से काम करेंगे।

‘गैबियन बॉक्स’ बाढ़ के पानी के नियंत्रण के लिए इस्तेमाल होने वाली सामान्य तकनीक है। समुद्र के खारे पानी के प्रभाव से तटीय क्षेत्रों में चट्टानों को टूटने से रोकने के लिए भी इनका इस्तेमाल किया जाता है। भारत और पाकिस्तान इस क्षेत्र में समुद्री सीमा विवाद के संबंध में लगातार संपर्क में हैं। सूत्रों के अनुसार बातचीत जारी होने के बावजूद भारत के सुरक्षा हितों के लिहाज से बाड़ लगाई जाएगी।