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सोमवार, 10 अगस्त 2020

जैसलमेर ग्रामदानी योजना के गाँवों का मूल उद्देश्य खत्म ,गोचर पर अतिक्रमण बढ़े

जैसलमेर ग्रामदानी योजना के गाँवों का मूल उद्देश्य खत्म ,गोचर पर अतिक्रमण बढ़े  


पहले :--सबै भूमि गोपाल की, नहीं किसी की मालिकी अब ;---सबै भूमि अध्यक्ष की, नहीं किसी की मालिकी

जैसलमेर केन्द्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर में भले ही धारा 370 व 35 ए हटा दी है, लेकिन राजस्थान के 196 गांव आज भी ऐसे हैं, जहां बाहरी व्यक्ति को जमीन खरीदने की अनुमति नहीं है। इनमे से 17  ग्राम  पंचायतें जैसलमेर जिले की हैं ,इन पंचायतों में  राजस्व से जुड़े मामलों में सरकार के राजस्व विभाग की भी कोई ‘पंचायती’ नहीं चलती है, बल्कि ग्रामीणों द्वारा निर्वाचित ग्राम सभा ही जमीन खरीद-फरोख्त से लेकर जमीन के नामांतरण, नक्शा जारी करने, गिरदावरी नकल देने जैसे सभी काम देखती है। ग्राम सभा में एक अध्यक्ष व एक सचिव का तथा कुछ सदस्य होते हैं, जो राजस्व रिकॉर्ड संधारण का काम देखते हैं।पचास साल पुराने भूमि सुधार आंदोलन की गति अब थम गयी ,भूमि सुधार  बजाय भूमियो पर गांवों में प्रभावशाली लोगो  के कब्जे हो  , भूमिहीन को भूमि नहीं मिलती ,इस कानून में सुधार  की आवश्यकता महसूस की जा रही हैं ,या कानून में सुधार हो या इसे राजस्व विभाग के अधीन किया जाए

जैसलमेर जिले में है ये ग्रामदानी गांव

जैसलमेर जिले में सत्रह गांव ग्रामदानी योजना से जुड़े हैं ,ग्रामदानी गांव लाणेला, कबीरबस्ती, देवा, सांवला, काठोडी, झाबरा, मजरा ,भैरवा, भागू का गांव, जसुराना, चैधरिया, रिदवा, आकल, थईयात, हेमा, देउंगा, भादासार, डेलासर व भैरवा है।इन गाँवो में पटवारी नहीं होता,सभी सत्रह ग्रामदानी गांवों का एक पटवारी होता हैं,गांव के राजस्व का कार्य अध्यक्ष ,सचिव ही देखते हैं ,प्रशासन और राजस्व विभाग  की कोई दखल अंदाज़ी नहीं होती,इसलिए ग्रामदानी गांवों का विकास ठप्प हैं ,


ग्रामदानी गांव का जन्म कैसे हुआ

संत विनोबा भावे द्वारा सन् 1951 में भूदान आंदोलन आरम्भ किया गया, जो स्वैच्छिक भूमि सुधार आंदोलन था। आंदोलन के दौरान 24 मई, 1952 को उत्तर प्रदेश के हमीरपुर जिले के मंगरोठ गांव के लोगों ने विनोबा के पास आकर पूरे गांव की जमीन ही दान कर दी। इस तरह ग्रामदान के विचार का जन्म हुआ। 1969 तक देशभर में लगभग सवा लाख ग्रामदानी गांव बन चुके थे। राजस्थान में 1971 में राजस्थान ग्रामदान अधिनियम-1971 पारित किया गया।

ग्रामदानी योजना का मूल उद्देश्य ही खत्म ,अतिक्रमण कब्जे बढ़े 

ग्रामदानी व्यवस्था का मुख्य उद्देश्य यह है कि गांव के लोग अपनी व्यवस्था को स्वयं संभालें एवं जो भी भूमि है उसको सबसे पहले गरीब को देते हुए अन्य को प्रदान करें एवं सब मिलजुलकर गांव का विकास करें। ग्रामीणों को जमीन के नामांतरण व हस्तारण के लिए न तो कोर्ट-कचहरी के चक्कर काटने पड़ते हैं और न ही रजिस्ट्री का पैसा देना पड़ता है। गांव में भूमि सम्बन्धी विवाद नहीं होने से लड़ाई-झगड़े नहीं होते। राजस्व गांवों में वर्तमान में सबसे ज्यादा विवाद जमीनों से जुड़े हैं।जैसलमेर जिले के कुछ गांवों का रिकॉर्ड राजस्व विभाग जयपुर द्वारा सीज किया हुआ हैं ,ग्रामदानी गाँवो में अध्यक्षों और प्रभावी लोगों की मनमानी चलती हैं ,भूमिहीन और गरीब व्यक्ति को जमीनें आवंटन की बजाय अध्यक्ष के परिवार और प्रभावशाली लोगो के बीच जमीनों की बंदरबांट हो रही हैं ,इन पर जिला प्रशासन और  राजस्व विभाग का कोई हस्क्षेप नहीं होने के चलते अध्यक्षों और प्रभावी लोगो द्वारा ही अंतिम फैसले किये जाते हैं ,सूत्रों की माने तो ग्रामदानी गांव काठोडी में एक ही व्यक्ति बीस साल से अध्यक्ष हैं ,इनके परिवार के पास पांच सौ बीघा से  ज्यादा जमीन हैं ,जबकि गांव में कई भूमिहीन आज भी हैं जिन्हे जमीन आवंटन की आवश्यकता हैं ,यहाँ तक की ग्रामदानी गांवों की गोचर और ओरण की जमीनों पर निरंतर अतिक्रमण हो रहे हैं ,कोई रोकने वाला नहीं हैं ,ग्रामीणों ने बताया की कम से कम गोचर की जमीन पर कब्जे न हो यह प्रशासन को देखना चाहिए ,ग्रामीणों ने जमीनों की टी पी की रकम भी कई गुना अधिक वसूल करने का आरोप लगाया , 

ग्रामदानी गांवों के नुकसान

ग्रामदानी गाँवो में बाहरी व्यक्ति चाहकर भी ग्रामदानी गांव में जमीन नहीं खरीद सकते।अब जबकि जमीने कम खेती के लिए भी कम पड़ रही हैं ,ऐसे में राज्य सरकार को साठ साल से अधिक पुराने नियमों में बदलाव करने चाहिए या ग्रामदानी गाँवो को राजस्व विभाग के अधीन कर  देना चाहिए ,ग्रामदानी योजना का मूल उद्देश्य वैसे भी खत्म हो गया हैं ,ग्रामदानी गांवों में जमीनों के विवादों का निपटारा नहीं होने से सैकड़ों प्रकरण बकाया पड़े हैं, और तो और भरष्टाचार और अनियमितताओं के चलते देवा सहित कुछ गाँवो का रेकर्ड राजस्व विभाग जयपुर द्वारा जब्त कर रखा हैं ,आपसी विवादों का निपटारा भी इन गांवों में नहीं हो पाता क्यूंकि ग्रामदानी गांव का अध्यक्ष ही सर्वे सर्व होता हैं ,उनकी मर्जी से फैसले होते हे न्याय नहीं।

  ग्रामदानी गांव का जन्म कैसे हुआ

ग्राम स्वराज एवं ग्रामदानी गांवों की परिकल्पना संत विनोबा भावे की थी।

संत विनोबा भावे द्वारा सन् 1951 में भूदान आंदोलन आरम्भ किया गया, जो स्वैच्छिक भूमि सुधार आंदोलन था। आंदोलन के दौरान संत विनोबा पदयात्रा रहे थे, 24 मई, 1952 को एक अनोखी घटना हुई। उत्तर प्रदेश के हमीरपुर जिले के मंगरोठ गांव के लोगों ने विनोबा के पास आकर पूरे गांव की जमीन ही दान कर दी। इस तरह ग्रामदान के विचार का जन्म हुआ। यह घटना गांधीजी के ट्रस्टीशिप के विचार को चरितार्थ कर देने जैसी थी। मंगरोठ गांव के लोगों ने कहा कि हमारा गांव अब एक परिवार बन गया है, इसलिए पूरे गांव का लगान ग्रामसभा एक साथ जमा कर देगी। 1969 तक देशभर में लगभग सवा लाख ग्रामदानी गांव बन चुके थे।

इस आंदोलन का नारा था

‘सबै भूमि गोपाल की, नहीं किसी की मालिकी’, उस समय के दुनिया के सबसे प्रसिद्ध लेखकों में से एक अमेरिकी पत्रकार लुई फिशर ने कहा था- ‘ग्रामदान पूरब की ओर से आने वाला सबसे अधिक रचनात्मक विचार है।’

foto lanela ka ran ,gramdani ganv
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गुरुवार, 21 अप्रैल 2011

लाखों पेड़ों की रक्षा को उठेंगे हजारों हाथ




लाखों पेड़ों की रक्षा को उठेंगे हजारों हाथ 
ओरण की सुरक्षा का बीड़ा 22 दिन में 24 लाख गायत्री मंत्रों का उच्चारण
बाड़मेर। एक ओर जहां अतिक्रमण और सरकारी स्तर पर आबंटन के कारण ओरण गोचर जमीन खतरे में है, वहीं सीमावर्ती क्षेत्र के चालीस गांवो लोगों ने ओरण की सुरक्षा का बीड़ा उठाया है। इसके लिए 22 दिन में 24 लाख गायत्री मंत्रों का उच्चारण किया जाएगा। 27 गांवों के चारों ओर अखण्ड ज्योत के साथ परिक्रमा की जाएगी और हजारों लोग एक साथ संकल्प लेंगे कि वे न तो ओरण की जमीन पर अतिक्रमण करेंगे न करने देंगे। ओरण के वृक्षों पर कुल्हाड़ी चलाना भी महापाप होगा। पर्यावरण शुद्धता को लेकर हो रहे स्वप्रेरित आंदोलन के लिए चालीस गांवों के लोगों ने करीब तीस लाख रूपए एकत्रित किए हैं।
 पर्यावरण की शुद्धता, वृक्षों के बचाव, चारागाह की जमीन के संरक्षण और सामाजिक भाईचारे की मिसाल का उदाहरण बनेंगे सीमावर्ती हरसाणी क्षेत्र के 40 गांव। बाड़मेर एवं जैसलमेर जिले में जमीनों के दाम बढ़ने के बाद सरकारी जमीन पर अतिक्रमण सबसे बड़ी समस्या हो गई है। लोगों ने ओरण की जमीन को भी नहीं बख्शा, जिसे यहां सदियों से देवी देवताओं की जमीन माना जाता है। इस जमीन को बचाने के कई नियम हैं, लेकिन पालना नहीं हो रही है।
हरसाणी क्षेत्र के रोहिड़ाला गांव में मालण देवी(लोकदेवी) के नाम ओरण की जमीन संरक्षित है। वहीं निकटवर्ती गांवों में नागणेच्या माता के नाम से ओरण है। हजारों बीघा इस ओरण की जमीन के भरोसे ही सीमावर्ती क्षेत्र का पशुधन जिंदा है। इसकी सुरक्षा को लेकर ग्रामीणों ने ग्रामीणों ने महापुरश्चरण यज्ञ करवाने का निर्णय किया है। इस यज्ञ में गायत्री मंत्र की 24 लाख आहूतियां दी जाएगी। 18 मई से 22 दिन तक चलने वाले इस आयोजन के दौरान 27 गांवों की परिक्रमा, ओरण के चारों तरफ दूध की कार, ओरण बचाव का संकल्प, संत महात्माओं के प्रवचन, नई पीढ़ी को ओरण के बारे में साहित्य प्रदान किया जाएगा। 
छत्तीस कौम की भागीदारी
ओरण बचाने के इस आयोजन में छत्तीस कौम की भागीदारी है। करीब तीस लाख रूपए ग्रामीणों ने एकत्रित किए हैं। आयोजन में सभी की भागीदारी सुनिश्चत करने के लिए गांव के अनुसार व्यवस्थाएं और कार्यक्रम तय किए गए हैं।
भावना से जुड़े हैं लोग
ओरण के प्रति लोगों में आस्था है। सदियों से ओरण में लाखों पशु पले हैं। लाखों पेड़ लगे हैं। पुरखों की इस परंपरा को जीवंत किया जा रहा है। - भूरसिंह, नखतसिंह गोरडिया, आयोजन समिति सदस्य