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मंगलवार, 13 जनवरी 2015

राजस्थान का खजुराहो 900 सालो से क्यों है वीरान




किराडू राजस्थान के बाड़मेर जिले में स्थित है। किराडू अपने मंदिरों कि शिल्प कला के लिया विख्यात है। इन मंदिरों का निर्माण 11वी. शताब्दी में हुआ था। किराडू को राजस्थान का खजुराहों भी कहा जाता है। लेकिन किराडू को खजुराहो जैसी ख्याति नहीं मिल पाई क्योकि यह जगह पिछले 900 सालों से वीरान है और आज भी यहां पर दिन में कुछ चहल-पहल रहती है पर शाम होते ही यह जगह वीरान हो जाती है , सूर्यास्त के बाद यहां पर कोई भी नहीं रुकता है।

राजस्थान के इतिहासकारों के अनुसार किराडू शहर अपने समय में सुख सुविधाओं से युक्त एक विकसित प्रदेश था। दूसरे प्रदेशों के लोग यहां पर व्यपार करने आते थे। लेकिन 12 वि शताब्दी में, जब किराडू पर परमार वंश का राज था, यह शहर वीरान हो जाता है। आखिर ऐसा क्यों होता है, इसकी कोई पुख्ता जानकारी तो इतिहास में उपलब्ध नहीं है पर इस को लेकर एक कथा प्रचलित है जो इस प्रकार है।

किराडू पर है एक साधू का श्राप-

कहते हैं इस शहर पर एक साधु का श्राप लगा हुआ है। करीब 900साल पहले परमार राजवंश यहां राज करता था। उन दिनों इस शहर में एक ज्ञानी साधु भी रहने आए थे। यहां पर कुछ दिन बिताने के बाद साधु देश भ्रमण पर निकले तो उन्होंने अपने साथियों को स्थानीय लोगों के सहारे छोड़ दिया।

एक दिन सारे शिष्य बीमार पड़ गए और बस एक कुम्हारिन को छोड़कर अन्य किसी भी व्यक्ति ने उनकी देखभाल नहीं की। साधु जब वापिस आए तो उन्हें यह सब देखकर बहुत क्रोध आया। साधु ने कहा कि जिस स्थान पर दया भाव ही नहीं है वहां मानवजाति को भी नहीं होना चाहिए। उन्होंने संपूर्ण नगरवासियों को पत्थर बन जाने का श्राप दे दिया। जिस कुम्हारिन ने उनके शिष्यों की सेवा की थी, साधु ने उसे शाम होने से पहले यहां से चले जाने को कहा और यह भी सचेत किया कि पीछे मुड़कर न देखे।

लेकिन कुछ दूर चलने के बाद कुम्हारिन ने पीछे मुड़कर देखा और वह भी पत्थर की बन गई। इस श्राप के बाद अगर शहर में शाम ढलने के पश्चात कोई रहता था तो वह पत्थर का बन जाता था। और यही कारण है कि यह शहर सूरज ढलने के साथ ही वीरान हो जाता है।

कुछ इतिहासकारो का मत है कि किराडू मुगलों के आक्रमण के कारण वीरान हुए , लेकिन इस प्रदेश में मुगलों का आक्रमण 14 वि शताब्दी में हुआ था और किराडू 12वी. शताब्दी में ही वीरान हो गया था इसलिए इसके वीरान होने के पीछे कोई और ही कारण है।

किराडू के मंदिरों का निर्माण-

किराडू के मंदिरों का निर्माण किसने कराया इसकी भी कोई पुख्ता जानकारी उपलब्ध नहीं है। हालाकि यहां पर 12वी. शताब्दी के तीन शिलालेख उपलब्ध है पर उन पर भी इनके निर्माण से सम्बंधित कोई जानकारी नहीं है। पहला शिलालेख विक्रम संवत 1209 माघ वदि 14 तदनुसार 24 जनवरी 1153 का है जो कि गुजरात के चौलुक्य कुमार पाल के समय का है। दूसरा विक्रम संवत 1218, ईस्वी 1161 का है जिसमें परमार सिंधुराज से लेकर सोमेश्वर तक की वंशावली दी गई है और तीसरा यह विक्रम संवत 1235 का है जो गुजरात के चौलुक्य राजा भीमदेव द्वितीय के सामन्त चौहान मदन ब्रह्मदेव का है।

इतिहासकारों का मत है कि किराडू के मंदिरों का निर्माण 11 वी. शताब्दी में हुआ था तथा इनका निर्माण परमार वंश के राजा दुलशालराज और उनके वंशजो ने किया था।

किराडू में किसी समय पांच भव्य मंदिरों कि एक श्रंखला थी। पर 19वी. शताब्दी के प्रारम्भ में आये भूकम्प से इन मंदिरों को बहुत नुक्सान पहुंचा और दूसरा सदियों से वीरान रहने के कारण इनका ठीक से रख रखाव भी नहीं हो पाया। आज इन पांच मंदिरों में से केवल विष्णु मंदिर और सोमेश्वर मंदिर ही ठीक हालत में है। सोमेश्वर मंदिर यहाँ का सबसे बड़ा मंदिर है। ऐसी मान्यता है कि विष्णु मंदिर से ही यहां के स्थापत्य कला की शुरुआत हुई थी और सोमेश्वर मंदिर को इस कला के उत्कर्ष का अंत माना जाता है।

किराडू के मंदिरों का शिल्प है अद्भुत- स्थापत्य कला के लिए मशहूर इन प्राचीन मंदिरों को देखकर ऐसा लगता है मानो शिल्प और सौंदर्य के किसी अचरज लोक में पहुंच गए हों। पत्थरों पर बनी कलाकृतियां अपनी अद्भुत और बेमिसाल अतीत की कहानियां कहती नजर आती हैं। खंडहरों में चारो ओर बने वास्तुशिल्प उस दौर के कारीगरों की कुशलता को पेश करती हैं।

नींव के पत्थर से लेकर छत के पत्थरों में कला का सौंदर्य पिरोया हुआ है। मंदिर के आलंबन में बने गजधर, अश्वधर और नरधर, नागपाश से समुद्र मंथन और स्वर्ण मृग का पीछा करते भगवान राम की बनी पत्थर की मूर्तियां ऐसे लगती हैं कि जैसे अभी बोल पड़ेगी। ऐसा लगता है मानो ये प्रतिमाएं शांत होकर भी आपको खुद के होने का एहसास करा रही है।

सोमेश्वर मंदिर भगवान् शिव को समर्पित है। भगवान शिव को समर्पित इस मंदिर की बनावट दर्शनीय है। अनेक खंभों पर टिका यह मंदिर भीतर से दक्षिण के मीनाक्षी मंदिर की याद दिलाता है, तो इसका बाहरी आवरण खजुराहो के मंदिर का अहसास कराता है। काले व नीले पत्थर पर हाथी- घोड़े व अन्य आकृतियों की नक्काशी मंदिर की सुन्दरता में चार चांद लगाती है। मंदिर के भीतरी भाग में बना भगवान शिव का मंडप भी बेहतरीन है।

किराडू शृंखला का दूसरा मंदिर भगवान विष्णु को समर्पित है। यह मंदिर सोमेश्वर मंदिर से छोटा है किन्तु स्थापत्य व कलात्मक दृष्टिï से काफी समृद्ध है। इसके अतिरिक्त किराडू के अन्य 3 मंदिर हालांकि खंडहर में तब्दील हो चुके हैं, लेकिन इनके दर्शन करना भी एक सुखद अनुभव है।यदि सरकार और पुरातत्व विभाग किराडू के विकास पर ध्यान दे तो यह जगह एक बेहतरीन पर्यटन स्थल के रूप में विकसित हो सकती है।

शनिवार, 7 सितंबर 2013

राजस्थान की धरोहर किराडू के प्राचीन मंदिर

देखिये खुबसूरत तस्वीरे। । राजस्थान की धरोहर किराडू के प्राचीन मंदिर
















यह स्थान राजस्थान के बाड़मेर से लगभग 35 किमी उत्तर-पश्चिम में है। किराडू के विश्व प्रसिद्ध पाँच मंदिरों का समूह बाड़मेर मुनाबाव रेलमार्ग पर खड़ीन स्टेशन से 5 किमी पर हथमा गांव के पास पहाड़ी के नीचे अवस्थित है। किराडू की स्थापत्य कला भारतीय नागर शैली की है। बताया जाता है कि यहाँ इस शैली के लगभग दो दर्जन क्षत विक्षत मंदिर थे लेकिन अभी ये केवल 5 हैं। यहाँ के मंदिरों में रति दृश्यों के स्पष्ट अंकन होने की वजह से किराडू को राजस्थान का खजूराहो भी कहा जाता है।

सन् 1161 के एक शिलालेख के अनुसार किराडू का प्राचीन नाम किरात कूप था तथा यह किसी समय परमार राजाओं की राजधानी था। इतिहासकारों के अनुसार किरातकूप पर गुजरात के चालुक्य राजवंश के प्रतिनिधि के रूप में परमार शासकों का शासन था। बताया जाता है कि चन्द्रावती के परमार राजा कृष्णराज द्वितीय के पुत्र सच्चा राजा ने 1075 एवं 1125 ईस्वी के मध्य इस स्वतंत्र राज्य की स्थापना की। इन्हीं के वंशज सोमेश्वर ने सन् 1161 तक किराडू पर शासन किया तथा सन् 1178 तक यह महाराज पुत्र मदन ब्रह्मदेव के अधीन रहा और उसके बाद आसल ने यहाँ शासन किया था। यही वह काल था जब मोहम्मद गौरी ने आक्रमण किया। यहाँ के मंदिरों में काफी मात्रा में विध्वंस के चिह्न मौजूद है।

सोमेश्वर मंदिर इस स्थान का सबसे प्रमुख और बड़ा मंदिर है। इसके मूल मंदिर के बरामदे के बाहर तीन शिलालेख लगे हैं। विक्रम संवत 1209 का शिलालेख कुमारपाल सोलंकी का है तथा दूसरा शिलालेख संवत 1218 का है जिसमें परमार शासक सिंधुराज से लेकर सोमेश्वर तक की वंशावली अंकित है। संवत 1215 के तीसरे शिलालेख से किराडू के विध्वंस तथा इसके जीर्णोद्धार का पता चलता है।

कुछ लोग किरातकूप की उत्पत्ति किरात जाति से भी मानते हैं। किरात जाति का महाभारत में भी उल्लेख है। यह वनवासी जाति शिव तथा पार्वती को आराध्य देव के रूप में पूजने वाली थी। कहा जाता है कि एक बार किरातों का राजा धृतराष्ट्र के पुत्र दुर्योधन को पकड़ कर ले गया। उस समय धर्मराज युधिष्ठिर के कहने पर दुर्योधन को किरातों से भीम एवं अर्जुन ने छुड़वाया था। यह भी मान्यता है कि किराडू को उसी किरात जाति से संबंध के कारण ही किरात कूप कहा जाने लगा होगा।

किराडू में पत्थर पर उत्कीर्ण समस्त कलाकृतियां बेमिसाल हैं। मंदिरों की शायद कभी यहां पूरी श्रृंखला रही होगी परन्तु आज केवल पांच मंदिरों के भग्नावशेष ही दिखाई देते हैं। एक भगवान विष्णु का तथा अन्य मंदिर भगवान शिव के हैं।

यहाँ के खंडहरों में चारों ओर विलक्षण शिल्प बिखरा पड़ा है, बाह्य भाग अब भी कलाकृतियों से पूर्णत: सुसज्जित है। यहाँ 44 स्तम्भ इसके गौरवशाली अतीत को अभिव्यक्त करते हैं। सोमेश्वर मंदिर के पास ही एक छोटा-सा सुंदर शिवालय भी है। यहाँ के सोमेश्वर मंदिर में पग-पग पर तत्कालीन समृद्ध प्रस्तर कला का सौन्दर्य बिखरा पड़ा है, जैसे- युद्ध कौशल के दृश्य, बिगुल, तुरही, नगाड़े, पंच गणेश व नाना देव-देवी की प्रतिमाएँ, समुद्र मंथन, रामायण तथा महाभारत की विभिन्न दृश्यावलियां, मंदिरों के बीच के भाग में बिखरे पड़े कलात्मक स्तंभ, कला खंड व कलश खंड, मैथुन व रति क्रिया के सभी प्रमुख अंगों का स्पष्ट अंकन आदि।

मंदिर के मंडप के भीतर उत्कीर्ण नारी प्रतिमाएं नारी सौंदर्य की बेजोड़ कृतियां हैं जिनमें से एक कला खंड नारी केश विन्यास से संबद्ध है। इसे देखकर संवरी हुई केश राशि एवं वसन की सिलवटे नारी के सहज स्वरूप तथा भाव का साक्षात दर्शन कराती है। गर्भगृह के द्वार पर मंदिर परंपरा की अवधारणा के अनुरूप द्वारपाल, क्षेत्रपाल, देव-देवी तथा मंदिर के मूल नायक की सूक्ष्म कृतियों से सज्जित है। नागर शैली के मंदिर की परंपरा में बने शिव मंदिरों की श्रेणी में यह मंदिर मरुगुर्जर शैली की उच्च कोटि की कला का बेहतरीन नमूना है।



किराडू के सोमेश्वर मंदिर के पास स्थित छोटे शिव मंदिर की शैली में सोमेश्वर जितनी सूक्ष्मता नहीं है इसका भी गुंबद खंडित है किंतु यह अंदर से फिर भी सुरक्षित है व खंडित नहीं है। इस मंदिर की वीथिका के सामने की ओर ही कुछ दूर जाकर शिव, विष्णु और ब्रह्मा के मंदिर है। इनमें से एक मंदिर के प्रवेश द्वार की अर्गला पट्टी पर नीचे की ओर गौरी तथा गणेश की बहुत ही आकर्षक प्रतिमा है जिसमें गौरी के हाथ में मोदक है और बालक गणेश उस मोदक को अपनी सूँड से उठाने का प्रयास करते दिखते हैं।

राजस्थान के रेगिस्तान में अवस्थित इतिहास और स्थापत्य कला का संगम किराडू अपने आप में अति विशिष्ट है। इसमें उत्कीर्ण शिल्प दसवीं सदी के गौरवशाली अतीत और कला वैभव का प्रबल साक्षी है।

सोमवार, 29 अगस्त 2011

किराडू जुडेगा कैयर्न से पचपदरा के वाईट पिरामिडों से निखरेगा बाडमेर का पर्यटन


किराडू जुडेगा कैयर्न से
पचपदरा के वाईट पिरामिडों



से निखरेगा बाडमेर का पर्यटन
          बाडमेर, 29 अगस्त। जिले में पर्यटन की संभावना को तलाशने के लिए भारतीय पर्यटन विकास निगम के अध्यक्ष एवं प्रबन्ध निदेशक डॉ. ललित के पंवार ने सोमवार को जिले का विस्तृत भ्रमण किया। उन्होने जिले में हाईड्रोकार्बन तथा खनन गतिविधियों से पर्यटन को जोडने की संभावना पर जिला कलेक्टर गौरव गोयल से उनके कक्ष में सोमवार को विस्तृत विचार विमर्श किया।
          इस अवसर पर डॉ. पंवार ने बताया कि जैसलमेर में सर्वप्रथम पर्यटन की शुरूआत वहां भूगर्भ में छिपे हाइड्रोकार्बन को तलाशने के लिए आरम्भिक सर्वे के लिए आने वाले विदेशी मेहमानों ने की थी, जिसकी बदोलत आज जैसलमेर पर्यटन के विश्व पटल पर छाया हुआ है। उन्होने बताया कि बाडमेर मे भी अब व्यापक स्तर पर हाईड्रोकार्बन अथवा तेल का उत्पादन हो रहा है तथा इससे पर्यटन को जोडा जा सकता है। उन्होने बताया कि जिले के 12 वीं शताब्दी के गौरवशाली तथा राजस्थान के खजुराहो के रूप में प्रसिद्ध किराडू के मंदिरों को कैयर्न एनर्जी के द्वारा गोद लेकर इसका पर्यटन स्थल के रूप में विकास कराया जा सकता है। उन्होने जिले में तेल गतिविधियों को भी पर्यटन से जोडने के निर्देश दिए। उन्होने बताया कि कैयर्न के किसी एक तेल के कुए तथा रिंग एवं अन्वेषण कार्य की साईट को विजिट ऑफ हाईड्रोकार्बन के रूप में विकसित कर इसे पर्यटकों के लिए खोला जा सकता है। उन्होने बताया कि स्थानीय सैलानियों का इन गतिविधियों में आकर्षण भी होता है।
          उन्होने बताया कि इसी तरह पचपदरा के नमक उत्पादन स्थलों को द लैण्ड ऑफ वाईट पिरामिड के रूप में उभारा जा सकता है, जिससे कि पर्यटक इनकी तरफ आकर्षित हो सकें। उन्होने इसी तरह जिले के अन्य पर्यटन स्थलों को भी विभिन्न पर्यटन दृष्टिकोणों के रूप में विकसित करने के लिए व्यापक कार्य योजना बनाने के निर्देश दिए।
डॉ. पंवार ने बाडमेर में आयोजित होने वाले थार महोत्सव की आगामी दस वर्षो की तिथियां निर्धारित करने तथा इसे अन्य प्रसिद्ध महोत्सव से लिंक नहीं कर स्वतन्त्र रूप से थार के मौसम के अनुकूल समय यथा संभव सर्दियों में आयोजित करवाने को कहा ताकि विदेशी पर्यटक इससे अधिक से अधिक रूप से जुड सकें। उन्होने बाडमेर में पर्यटन का राष्ट्रीय स्तर का सेमिनार आयोजित करने तथा पर्यटन उद्योग के विभिन्न संगठनों यथा होटल, टूर एण्ड ट्रेवल्स, टूरिस्ट गाइड आदि को सक्रिय रूप से भागीदारी के लिए आमन्त्रित करने के निर्देश दिए। उन्होने बताया कि बाडमेर में पर्यटन की व्यापक संभावना है तथा यहां की कला एवं संस्कृति, ग्रामीण परिवेश, संगीत एवं नृत्य, हस्तशिल्प आदि अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर सराहे जा चुके है।
इससे पूर्व जिला कलेक्टर गौरव गोयल ने जिले में पर्यटन गतिविधियों की जानकारी दी तथा थार महोत्सव एवं पर्यटन के विभिन्न तत्वों से अवगत कराया। उन्होने बताया कि बाडमेर में पर्यटन अधिकारी तथा पर्यटक सूचना केन्द्र नहीं होने से पर्यटकों को नही जोडा जा रहा है। उन्होने बताया कि घरेलू पर्यटकों के लिए बाडमेर में आदर्श स्टेडियम में मनोरंजन प्लाजा का विकास किया जा रहा है तथा यहां म्युजिकल फाउटेन्ट आकर्षण का केन्द्र होगा।
इस मौके पर अतिरिक्त जिला कलेक्टर अरूण पुरोहित भी उपस्थित थे।