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रविवार, 20 मार्च 2011

बाड़मेर का विश्व प्रसिद्ध गैर डांडिया नृत्य








बाड़मेर का विश्व प्रसिद्ध

गैर डांडिया नृत्य

पश्चिमी राजस्थान का सीमान्त जिला बाड़मेर अपनी लोक संस्कृति, सभ्यता व परम्पराओं का लोक खजाना हैं।जिले में धार्मिक सहिष्णुता का सागर लहराता हें। इस समुद्र में भाईचारे की लहरें ही नहीं उठती अपितु निष्ठा, आनन्द, मानवता, करूणा, लोकगीतसंगीत, संस्कृति व परम्परोओं के रत्न भी मिलते हैं। बाड़मेर की जनता अपनी समृद्ध कला चेतना निभा रही हैं। यह प्रसन्नता की बात हैं। जिले को गौरव प्रदान करने में गैर नृतकों ने अहम भूमिका निभाई हैं।

मालाणी पट्टी में गैर नृत्यों की होली के दिन से धूम रहती हैं। यह धूम कनाना, लाखेटा, सिलोर, सनावड़ा सहित अने क्षेत्रों में समान रूप से रहती हैं। यही गैर नृत्य बाड़मेर की समृद्ध परम्परा व लोक संस्कृति का प्रतीक हैं। प्रतिवर्ष चैत्र मास में अनेक गैर नृत्य मेले लगते हैं। इन मेलों का धार्मिक, सामाजिक व सांस्कृति महत्व समान हैं। लाखेटा में किसानों का यह रंगीला मेला प्रतिवर्ष आयोजित किया जाता हैं। पिछले चार सौ वर्षो से लोगो का प्रमुख धार्मिक आस्था स्थल लाखेटा हैं। जहां बाबा संतोष भारती की समाधि हैं। गैर नर्तको के सतर से अधिक दल इस मेले में भाग लेते हैं। सूय की पहली किरण के साथ गैर नृत्यों का दौर आरम्भ होता हैं। माटी की सोंधी महक, घुंघरूओं की झनक से मदमस्त कर देती हैं। किसानों का प्रमुख गैर नृत्य मेला जिसमें बाड़मेर, जोधपुर, पाली, जालोर जिलो से भी गैर नृतक शरीक होकर इस गैर नृत्य मेले को नई ऊंचाईयां प्रदान करते हैं।

गांवो से युवाबुजुर्गो के जत्थे हर्षोल्लास के साथ रंग बिरंगी वेशभूषा और लोक वाद्य यंत्रों के साथ भाग लेते हैं। मेले में युवा ग्रामीण गोलाकरअर्द्ध गोलाकार घेरे में विभिन्न मुद्राओं में ोल की ंकार, थाल टंकार पर नृत्य करते और हाथों में रखी एक मीटर की डण्डी आजू बाजू के गैरियों की डण्डियों से टकराते हैं और घेरे में घूमते हुए नृत्य करते हैं। गैरिये चालीस मीटर के घाघरे पहन हाथों में डाण्डियें, पांवो में आठआठ किलो वजनी घुंघरू पहन जब नृत्य करते हैं तो पूरा वातावरण कानो में रस घोलने लगता हैं। ोल की ंकार और थाली की टंकार पर आंगीबांगी नांगी जत्था गैर, डाण्डिया गौरों की नृत्य शैली निहारने के लिये मजबूर कर देती हैं। शौर्य तथा लोकगीतों के साथ बारीबारी से गैर दलों द्वारा नृत्य का सिलसिला सूर्यास्त तक जारी रहता हैं। 1520 समूह गैरियों के रूप में भाग लेते हैं गैर दलों की वेशभूषा के अनुरूप ही विभिन्न नृत्य शैलियां होती हैं। सफेद आंगी जो 4040 मीटर कपडे की बनी होती हैं। उस पर लाल कपडा कलंगी लगाकर जब नृत्य करते हैं तो मेले की रंगीनियां तथा मांटी की सोंधी महक श्रद्घालुओं को झूमने पर मजबूर कर देती हैं। सम्पूर्ण मेला स्थल गीतों, फागो और लोकवाद्य-यंत्रों की झंकारों, टंकारो व ंकारो से गुंजायमान हो उठता हैं। लोक संस्कृति को संरक्षण देने वाले लाखेटा, कनाना, कोटडी, सरवडी, कम्मो का वाडा, भलरों का बाडा, मिया का बाडा, खुराणी सहित आप पास के क्षेत्रों में गैर दल चंग की थाप पर गातेनाचते हैं। वहीं इसी क्षेत्र की आंगी बांगी की रंगीन वेशभूषा वाली डाण्डिया गैर नृत्य दल समां बांधने में सफल ही नहीं रहते अपितु मेले को नई ऊंचाईयां प्रदान करते हैं। वीर दुर्गादास की कर्मस्थली कनाना का मेला जो शीतलासप्तमी को लगता हैं, अपने अपन में अनूठा गैर नृत्यमेला होता हैं जो सिर्फ देखने से ताल्लुक रखता हैं। हजारों श्रद्घालु मेले में भाग लेते हैं। सनावड़ा में भी होली के दूसरे दिन का गैरियों का गैर नृत्य वातावरण को रंगीन बना देता हैं। पूरा आयोजनस्थल दिल को शुकून प्रदान करता हैं।

शनिवार, 19 मार्च 2011

PYARI BITIYA PARUL KI AUR SE AAP SAB KO HAPPY HOLI AND DHULANDI....

PAPAJI KE SABHI FACE BOOK AUR BLOG KE MITRO KO HAPPY HOLI....HAPPY HOLLY ALL FACEBOOK AND BLOG FRIENDS OF MY DADDY SHREE CHANDAN SINGH BHATI...KHAMMA GHANI....UNCLES..AUNT AND BROTHER SISTER...DADAJI,DADIJI.....

शुक्रवार, 18 मार्च 2011

जिला कलेक्टर गौरव गोयल कीबाडमेर में अनूठा आगाज एक सौ बेटियों के जन्म का ढ्रंढ महोत्सव मनाया गया।


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बेटियों की की ढ्रंढ
बाडमेर में अनूठा आगाज


बताया बेटो से बेहतर
बाडमेर, 18 मार्च। कम लिंगानुपात तथा बेटियों के प्रति उपेक्षित व्यवहार वाले बाडमेर जिले में शुक्रवार का दिन ऐतिहासिक रहा, जब होली पर ढ्रंढ  के बेटो के एकाधिकार वाले उत्सव पर बेटियों के जन्म की खुशी मनाई गई तथा बेटियों की ढ्रंढ  कर सूचना प्रौद्योगिकी के युग में पुत्री रत्न की महता जताई गई।
जिला मुख्यालय के स्वास्थ्य भवन में शुक्रवार प्रातः जिला कलेक्टर गौरव गोयल की मौजूदगी में करीब एक सौ बेटियों के जन्म का ढ्रंढ  महोत्सव मनाया गया। चंग की थाप तथा थाली की झन्कार के बीच बेटियों को बेटो के समान बताया गया तथा बेटे बेटी के बीच भेदभाव को मिटाने की प्रेरणा लेने का आव्हान किया गया। इस मौके पर बेटियों का ढ्रंढ  संस्कार विधिवत रूप से किया गया और उन्हें माला पहनाकर स्वागत किया गया। कार्यक्रम के दौरान 2010 में जन्मी 100 बेटियों को खिलौने, कपडे व अन्य उपहार भेट किये गये। कार्यक्रम के दौरान चंगधमाल पर गीतों से माहौल रंगीन हुआ। वहीं स्वास्थ्य भवन के मुख्य द्वार पर रंगोली उकेरी गई।
महिला आईएएस से प्रेरणा
इस मौके पर जिला कलेक्टर गोयल ने विभिन्न क्षेत्रों में महिलाओं के बेहतर प्रदार्न के उदाहरण देते हुए कहा कि उनके आईएएस के बैच में पहली बार सबसे ज्यादा लडकियां आई थी, जो बेटियों के बेहतर होने का प्रमाण है। उन्होने बालिका शिक्षा पर बल देते हुए कहा कि यदि एक बेटी पती है तो दो परिवार पते है। इस अवसर पर मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डां. गणपतसिंह राठौड ने कहा कि बेटियों के प्रति इस तरह के आयोजन नियमित रूप से करवाए जाएगे। महिला एवं बाल विकास विभाग की उप निदोक विनिता सिंह ने बेटियों के जन्म पर ढ्रंढ महोत्सव के आयोजन को अनोखा बताया। वहीं केयर्न इण्डिया की ओर से सीएसआर प्रमुख बी आर ग्वाला ने भी बेटियों को सम्मानित किया।
पिता के लिए बजी तालियां
मुख्यतः बेटियों के लिए आयोजित कन्या ढ्रंढ  महोत्सव में अधिकाश बेटियों को लेकर उनकी माताएं ही पहुंची थी। इस स्थिति को देखते हुए जिला कलेक्टर गोयल ने बेटियों के पिता के बारे मे पूछा तो वहां एक बेटी के पिता जयप्रका मौजूद थे। इस पर जिला कलेक्टर ने उनका स्वागत करते हुए ताली बजाई तो स्वास्थ्य भवन तालियों से गूंज उठा।
भविश्य मे भी होंगे आयोजन
इस कार्यक्रम का मुख्य उदृश्य जिले में गिरते लिंगानुपात को बराबर करना है। जिला कलेक्टर ने बताया कि बेटे बेटियों के बीच भेदभाव को मिटाने के लिए भविश्य मे भी इस तरह के आयोजन किए जाते रहेंगे।
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मंगलवार, 15 मार्च 2011

फाग की मस्ती ,थार मरुस्थल में चंग बजने लगे



बाड़मेर[चन्दन भाटी] बाड़मेर जिले में मदोत्सव एवं रंगोत्सव की मस्ती छाई हुई हैं।आधुनिकता की दौड़के बावजूद थार मरुस्थल में लोक कला और संस्कृति से जुड़ी परम्पराओं का निर्वाह किया जा रहा हैं।ग्रामीण अंचलों में होली की धूम मची हैं।ग्रामीण अंचलों में रंगोत्सव की मदमस्ती बरकरार हैं।ग्रामीण चौपालों पर सूरज लते ही ग्रामीण चंग की थाप पर फाग गाते नजर आते हैं।वहीं फागुनी लूर गाती महिलाओं के दल फागोत्सव के प्रति दीवानगी का एहसास कराती हैं।



सीमावर्ती बाड़मेर जिले की लोक परम्पराओं का निर्वहन ग्रामीण क्षैत्रों में आज भी हो रहा हैं।रंग और मद के इस त्यौहार के प्रति ग्रामीण अंचलों में दीवानगी बरकरार हैं।ग्रामीण चौपालों परगा्रमीणों के दल सामुहिक रुप से चंग की थाप पर फाग गीत गाते नजर आते हैं।जिले में लगातार

पड़ रहे अकाल का प्रभाव अधिक नजर नहीं आ रहा ।अलबता होली के धमाल के लिए प्रसिद्धसनावड़ा गांव के बुर्जुग रुपाराम ने बताया कि अकाल के कारण गांव के युवा रोजगार के लिए गुजरात गए हुए हैंअकाल के कारण हमारे गॉव में होली का रंग फीका नही। पडता।होली से

तीन चार रोज पूर्व रोजगार के लिए बाहर गए युवा पर्व मनाने पहफॅच जाएगे।गांव की परम्परा हैंजो हम अपने बुजुर्गों के समय से देखते आ रहे हैं।इसकी पालना होती हैं।



होली से 15 दिन पूर्व गांव में होली का आलम शुरु होता हैं।चोपाल पर शाम होते होते गांव के बडे बुड़े जवान बच्चे सभी एकत्रित हो जाते हैं।चंग बजाने वालो की थाप पर गा्रमिण सामुहिक रुप से फाग गाते हैं।वहीं गांव की महिलाए रात्री में एक जगह एकत्रित हो कर बारी बारी से घरों के आगे फाग गाती हैं।जो महिलाऐं इस दल में नहीं आती उस महिला के घर के आगे जाकर महिला दल अश्लील फाग गाती हैं,जिसे सुनकर अन्दर बैठी महिला शर्माकर दल मे शामिल हो जाती हैं।



महिलाओं द्घारा दो दल बनाकर लूर फाग गाती हैं।लूर में दोनों महिला दल आपस में गीतों के माध्यम से सवालजवाब करती हैं।लूर थार की परम्परा हैं।लुप्त हो रही लूर परम्परा सनावडा तथा सिवाना क्षैत्र के ग्रामीण अंचलों तक सिमट कर रह गई हे ।फाग गीतों के साथ साथ डाण्डिया गेर नृत्य का भी आयोजन होता हैं।भारी भरकम घुंघरु पांवों में बांध कर हाथें में आठ आठ मीटर लम्बे डाण्डियेंल करोल की थाप और थाली टंकार पर जब गेरिऐं नृत्य करते हैं तों लोक संगीत की छटा माटी की सौंधी में घुल जाती हैं। सनावडा में होली के दूसरे दिन बडे स्तर पर गेर नृत्यो का आयोजन होता हैं।जिसमें आसपास के गांवों के कई दल हिस्सा लेते हैं।ग्रामीण क्षैत्रों में होली का रंग जमने लगा हैं।शहरी क्षैत्र में भी गेरियों के दल इस बार नजर आ रहे हैं।जो शहर की गलियों में चंग की थाप पर फाग गाते नजर आते हैं।

शनिवार, 12 मार्च 2011

बेटियों की होगी ढूंढ, बजेगी थाली


बेटियों की होगी ढूंढ, बजेगी थाली 

बाड़मेर। बेटियों के प्रति लगाव बढ़ाने एवं बेटे-बेटी के फर्क को दूर करने के उद्देश्य से इस बार चिकित्सा विभाग के मार्फत जिला प्रशासन बेटियों का ढूंढ संस्कार करवाएगा। बेटी के जन्म पर प्रशासन की ओर से परिवार को बधाई दी जाएगी और यथा संभव बेटी के जन्म पर भी थाली बजाई जाएगी।
 जिला कलक्टर गौरव गोयल ने बताया कि बेटे बेटी में भेद खत्म करना और कन्याभ्रूण के प्रति संवेदनशीलता जरूरी है। सीमावर्ती जिले में लिंगानुपात की स्थिति में काफी अंतर है। इसके लिए जरूरी है कि इस भेद को खत्म करने का माहौल तैयार किया जाए। इसके लिए अब इस प्रकार के कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे जिसमें बेटी के जन्म की खुशियां परिवार और समाज में सामने आए। इसकी शुरूआत होली से की जाएगी।  होली पर बेटों की ढूंढ का कार्यक्रम होता है।
बेटियों के लिए यह उत्सव नहीं मनाया जाता है। मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अघिकारी को निर्देश दिए है कि होली पर सामूहिक ढूंढ का उत्सव रखा जाए। इसमें बाड़मेर शहर मे इस वर्ष में जन्म लेने वाली बेटियों को आमंत्रित किया जाएगा। स्वास्थ्य भवन में होने वाले इस कार्यक्रम में बेटियों की ढूंढ की रस्म की जाएगी। साथ ही संदेश दिया जाएगा कि बेटे बेटी में फर्क नहीं रखा जाए।
बधाई देने की योजना तय करेंगे
जिला कलक्टर ने बताया कि जिले के चिकित्सा प्रभारियों को ऎसे कार्ड दिए जाएंगे जिसमें बेटी के जन्म पर संबंघित को बधाई दी जाए। जिला कलक्टर, जिला प्रमुख, नगरपालिका अध्यक्ष सहित अन्य की तरफ से मिलने वाली इस बधाई से बेटी का जन्म होने पर भी परिवार में एक माहौल तैयार होगा।