रविवार, 4 मार्च 2012

नाइट क्‍लब बंद करने से नहीं होंगे रेप?

नई दिल्‍ली. पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने बलात्कार जैसी समस्याओं से निपटने के लिए सुझाव दिया है कि शहरों के नाइट क्लबों को बंद कर दिया जाए। एक फायर ब्रांड राजनीतिक नेता मानी जाने वाली ममता से ऐसी प्रतिक्रिया मिलना बंगाल ही नहीं पूरे देश के लिए दुखद है। कोलकाता को वैसे भी देश के उन शहरों में माना जाता रहा है जो अपने पूरे रवैये में बहुत सुसंस्कृत और प्रगतिशील है।
 
यही वो शहर है जहाँ सबसे पहले नाइट क्लबों की शुरुआत हुई। नाइट क्लबों को यहाँ केवल सेक्स और ऐश का केंद्र नहीं माना जा सकता। उषा उत्थुप जैसे कुछ प्रतिष्ठित पॉप सिंगर्स ने यहाँ आधुनिक भारतीय संगीत को संवर्धित भी किया है। और अगर ऐसा ना भी हुआ होता, तो बलात्कार की समस्या से निपटने का ये कौन सा तरीका हुआ। यह तो लगभग ऐसा ही है कि शिकारी को आता देख कर कबूतर खुद अपनी आँखें बंद कर ले।

महाराष्ट्र के गृह मंत्री आर आर पाटिल ने भी डांस बारों पर रोक लगा कर कुछ ऐसा ही करना चाहा था। विडम्बना ये है कि ममता ने तो स्त्री होकर ऐसा स्त्री विरोधी सुझाव दिया है। ऐसी मोरल पोलिसिंग का सटीक जवाब मिला था प्रमोद मुथालिक को, जिनके घर में महिलाओं ने पिंक पेंटीज भेज कर वेलेंटाइन डे पर कपल्स की पिटाई करने पर विरोध जताया था। पहले बलात्कार को ओपोज़िशन की साज़िश बताना और फिर उसके हल के रूप में इस तरह के प्रतिबंधों का सुझाव देना ना केवल ये बताता है कि मुख्य मंत्री जी राजनीतिक हवस में स्त्री-पुरुष व समाज के सरोकारों से ऊपर उठ कर महज़ एक राजनीतिक प्राणी बन गयी हैं बल्कि सांस्कृतिक तथा बौद्धिक तौर पर दिवालिया भी हो गयी हैं।

एक तरफ तो हम बात करते हैं बाज़ार और समाज को खोलने की, वैश्वीकरण की, जिसमे सभी तरह का खुलापन शामिल है, दूसरी तरफ हम अपने समाज पर इस तरह के अतार्किक प्रतिबन्ध लगा कर बलात्कार जैसी समस्या के सुलझने की आशा करें - ये अब दुखद होने की सीमा को लांघ कर हास्यास्पद हो गया है। फिर हमारे 'उदार' समाज और दुनिया के रुढ़िवादी समाजों में क्या फर्क रहा जहाँ महिलाओं को अंग्रेजी साहित्य भी गुपचुप पढने के लिए बाध्य होना पड़ता है।

एक समाज की स्थिति को इस बात से आँका जाता है कि उसकी स्त्रियों के साथ कैसा व्यवहार हो रहा है। हमारे यहाँ मामला और भी जटिल हो गया है। हम अब हर सामाजिक समस्या को सीधे तौर पर राजनीति से जोड़ने लगे हैं जो गलत है। हर बात का ठीकरा राजनीति पर नहीं फोड़ा जा सकता। अगर समाज में बलात्कार हत्या जैसे अपराध बढ़ रहे हैं तो उनका उपचार स्वतंत्रता पर प्रतिबंध लगाना नहीं बल्कि उसे एक स्वस्थ वातावरण देना है। स्त्रियाँ अगर दिखाई नहीं देंगी तो बलात्कार कि समस्या ख़त्म हो जायेगी- यह मानना तो अपने आप में ही मूर्खतापूर्ण है। जिन समाजों में स्त्री को घर के अन्दर ही रखा जाता है और जो 'होलिएर देन दाऊ' का रवैया रखते हैं, वहां महिलाओं पर सबसे ज्यादा अत्याचार होते हैं, बस आपको सुनाई नहीं देते क्योकि महिलाओं को अपनी आवाज़ पर ही अधिकार नहीं।

एक शहर के क्लबों, डांस बारों को बंद करके उसकी विशिष्ट संस्कृति का हम गला घोंट देते हैं, इससे अपराध ख़त्म या कम नहीं हो सकते। प्रतिबन्ध लगाने का चलन समाज में पतनशीलता का द्योतक है और उसकी लोकतांत्रिक व्यवस्था के हर कोने से भर्त्सना होनी चाहिए।

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