बुधवार, 8 अक्तूबर 2014

भारतीय संस्कृति के शिल्पकार भगवान वाल्मीकि का प्रकटोत्सव है आज

भगवान वाल्मीकि की वाणी को सुनकर कौन ऐसा प्राणी है जो मोक्ष रूपी परम गति को प्राप्त न हो? उन आदिकवि वैदिक दृष्टि और काव्य सृष्टि की क्षमता से सम्पन्न भगवान वाल्मीकि जी ने ‘रामायण’ के माध्यम से वेद का सार और वैदिक सूक्तियों का वैभव मानव जाति तक पहुंचाया है।
भारतीय संस्कृति के शिल्पकार भगवान वाल्मीकि का प्रकटोत्सव है आज
‘सुंदरकांड’  महत्वपूर्ण अभिव्यंजना का भंडार है। जो लोग इसकी गहराई में जाना चाहते हैं, उनके लिए रामायण गहन अध्ययन का अक्षय भंडार है। आश्विन मास की शरद पूर्णिमा को आदिकवि भगवान वाल्मीकि जी का प्रकट दिवस मनाया जाता है। उन्होंने संस्कृत भाषा में रामायण की रचना की जो संसार का पहला आदिकाव्य है।


एक दिवस सुबह तमसा नदी के अत्यंत निर्मल जल वाले तीर्थ पर भगवान वाल्मीकि जी अपने शिष्य भारद्वाज के साथ स्नान के लिए गए। तब वहां नदी के किनारे पेड़ पर क्रौंच पक्षी का एक जोड़ा अपने में मग्र था, तभी व्याध्र ने इस जोड़े में से नर क्रौंच को अपने बाण से मार गिराया और मादा क्रौंच भयानक विलाप करने लगी तो करुणा के महासागर भगवान वाल्मीकि जी का हृदय इतना द्रवित हुआ कि उनके मुख से अचानक यह श्लोक फूट पड़ा :

‘मा निषाद प्रतिष्ठां त्वम: शास्वती समा।
यत्क्रौंचमिथुनादेकमवधी: काममोहित्तम्।।’’

करुणा में से काव्य का उदय हो चुका था जो वैदिक काव्य की शैली, भाषा और भाव से एकदम अलग व नया था इसलिए भगवान वाल्मीकि जी को ब्रह्मा ने आकर कहा कि : ‘‘आपने आदि श्लोक की रचना की है इसलिए आप आदिकवि हैं, अपनी इसी श्लोक शैली में रामायण कथा लिखना। इस पृथ्वी पर जब तक नदियां और पर्वतों की सत्ता रहेगी, तब तक संसार में रामायण की कथा का प्रचार होता रहेगा।

उसी छंद में उन्होंने रामायण में श्रीरामचंद्र जी का उज्ज्वल चरित्र निबद्ध किया। रामायण आदिकवि भगवान वाल्मीकि जी द्वारा लिखा गया संस्कृत का एक अनुपम महाकाव्य है। भगवान वाल्मीकि ने नई भाषा, नए छंद, नए कथ्य, नए अंदाज और भावभूमि के साथ पहला आदिकाव्य लिखकर आदिकवि होने का गौरव पाया। इसके 24,000 श्लोक हिन्दू संस्कृति के वे अंग हैं जिनके माध्यम से रघुवंश के राजा श्रीरामचंद्र जी की गाथा कही गई।

रामायण कथा पंचभूत जगत के प्रत्येक प्राणी का प्राणायन है। अमृत प्राण को मूर्त रूप देकर भगवान वाल्मीकि जी ने सीता राम की सुंदर मूर्ति को संसार के सामने प्रतिष्ठित किया है, जिसे प्राणी अपने-अपने संस्कार के अनुरूप अपने अंतरंग में आत्मसात कर सकता है।

साभार  —डा. देव सिंह ‘अद्वैती’

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