सोमवार, 30 जुलाई 2018

बाड़मेर। आत्मा के शुद्धिकरण व पापों से मुक्त होन का एक प्रशस्त मार्ग है प्रतिक्रमण- साध्वी सिद्धांजना

बाड़मेर। आत्मा के शुद्धिकरण व पापों से मुक्त होन का एक प्रशस्त मार्ग है प्रतिक्रमण- साध्वी सिद्धांजना


रिपोर्ट :- चन्द्रप्रकाश बी.छाजेड़ / बाड़मेर

बाड़मेर। प्रतिक्रमण जैन धर्म की एक दैनिक आवश्यक प्रक्रिया है। जिसे श्रमण व श्रमणोपासक के लिए समान रूप से पालन करने का विधान है। इसका संबंध आत्मा से हे न की शरीर से। आत्मा के शुद्धिकरण व पापों से मुक्त होन का एक प्रशस्त मार्ग है प्रतिक्रमण। यह उद्बोधन स्थानीय जैन न्याति नोहरा में गुरूमां साध्वी सुरंजना महाराज ने अध्यात्मिक चातुर्मास 2018 के अन्तर्गत जैन न्याति नोहरा में उपस्थिति जनसमुदाय को संबोधित करते हुए कहा। 


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साध्वीश्री ने कहा कि कई लोग रोज-रोज प्रतिक्रमण करना और मिच्छामी दुक्कड़म देना, फिर वही पाप करना, यह कैसा प्रतिक्रमण है। इससे अच्छा है की वर्षभर में एक ही बार प्रतिक्रमण कर ले। आखिर इसमें बुराई क्या है, जो ऐसा कहते है, वे प्रमादवश ही ऐसा कहते है। प्रमाद एक दुर्गुण हे जो आत्मा के उत्थान में बाधक बनता है। पारसमणि के स्पर्श से लोहा भी सोना बन जाता है वैसे ही शुद्ध भावपूर्ण किए गए प्रतिक्रमण से आत्मा शुद्ध बनती है। साध्वीवर्या ने कहा कि प्रतिक्रमण ऐसा करो कि जब हमारे पाप हमारी आंखों के सामने आये तब हमारा ह्दय आत्मग्लानि से गद्गद हो जाये और आंखे पश्चाताप के आंसुओं ने नम हो जाए। धन से धर्म को मुख्यता देवे, परिवार से परमात्मा को मुख्यता देवे। व्यक्ति का सबकुछ चला जाये लेकिन धर्म नही जाना चाहिए है, धर्म चला गया तो व्यक्ति का सबकुछ चला गया। इतने वर्षों में हमारा खान-पान, रहन-सहन सब कुछ बदल गया लेकिन धर्म क्रियाएं अभी भी यथावत है। जब तक सार दुनिया में बदलाव आये या न आये ये महत्व नहीं रखता लेकिन धर्म क्रियाओं में बदलाव आना अति महत्वपूर्ण है। 


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व्यक्ति ट्रेन, बस, स्कूल व संसारी की अन्य क्रियाओं में घंटों-घंटों इंतजार कर लेता लेकिन धर्म क्षेत्र में उससे इंतजार नही होता है। हमारे जीवन में जहां बदलाव लाना था वहां अभी तक हम बदलाव नही ला सके जब तक हमारे जीवन में बदलाव नही आयेगा तब तक हम अपने कर्मों को पतला नही कर पायेगें और नये कर्म हमारे जीवन में तंबू डाले, डेरा डाले बैठे रहेगें और हम इनसे मुक्ति प्राप्त नही कर सेकेंगें। मुक्ति प्राप्त करने का मार्ग एक ही है मात्र चातुर्मास ओर चातुर्मास के अंदर चार कषाय के ऊपर विजय प्राप्त करके मन में समता, शांति, समरसता व धीरज को स्थान देकर हमें चातुर्मास की प्रणाली को प्रारम्भ करना है। जैन धर्म इतना अतिसुक्ष्म मार्ग है जिसमें माला फेरने से भी मोक्ष हो सकता है, नवकारसी, सामायिक, दया पालन कर करके भी मोक्ष का मार्ग प्राप्त किया जा सकता है। 


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साध्वीश्री ने कहा कि रोज साफ करने से जैसे मकान स्वच्छ रहता हे, वैसे ही प्रतिनिधि प्रतिक्रमण करने से मन भी साफ रहता है। अतः प्रतिक्रमण करने आत्मा की रोज सफाई होती है। जाने-अनजाने में जो पाप रोज हो जाते है, उसका प्रायच्छित और एसी भूल दूबारा न हो यह सावधानी रखनी ही चाहिए। अगर हम प्रतिक्रमण ही नही करेगें तो ये विचार कैसे उत्पन्न होगें। प्रतिक्रमण करने से आत्म कल्याण के साथ -साथ पापों की भी सफाई होती है। जो लोग पापों की सफाई रोज करते है, उनकी आत्मा पवित्र व सरल बनती है।
खरतरगच्छ चातुर्मास समिति के अध्यक्ष गौतम डूंगरवाल व मिडिया प्रभारी चन्द्रप्रकाश बी. छाजेड़ ने बताया कि चातुर्मास दरम्यान रविवार को आयोजित किए गए दीपक एकसाना तप में नन्हें-मुन्ने बालकों के साथ ही युवाओं ने बढ़-चढ़कर भाग लिया। इस तप में कई युवा ऐसे भी थे जिन्होनें अपने जीवन में प्रथम बार धर्म मार्ग से जुड़कर गुरूवर्याश्री की प्रेरणा से दीपक एकसाना तप किया। प्रवचन के दौरान महिलाओं व पुरूष ने विभिन्न तपस्यों के गुरूमुख से पच्चखाण ग्रहण किए। प्रवचन में संघपूजन का लाभ शंकरलाल छाजेड़ रावतसर वालों ने लिया।

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