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सिनेमा ने सौ साल से याद रखा है गांधी को

जयपुर, ३१ जनवरी. जिफ के दूसरे दिन आज कई महत्वपूर्ण और मनोरंजक फिल्मों का प्रदर्शन हुआ. समारोह के प्रति जयपुर के लोगों में खासा उत्साह नज़र आया. आज शहर के आठ स्थलों पर फिल्मों का प्रदर्शन किया गया जिनमें गोलछा सिनेमा, गोलछा ट्रेड सेंटर, चेंबर भवन, महारानी कॉलेज, एम जी डी स्कूल, पर्ल अकेडमी, स्पेस व फन सिनेमा शामिल हैं. चंद्रमहल में हरिश्चंद्र ची फेक्ट्री के साथ ही के आसिफ की  मुगले आज़म और गुरुदत्त कि कागज के फूल भी दिखाई गई. हिन्दी सिनेमा में मील का पत्थर बन चुकी 'मुगले आजम' 48 वर्ष पहले प्रदर्शित हुई थी, लेकिन पांच दशक गुजर जाने के बावजूद सलीम-  के सिर चढ़कर बोल दर्शको अनारकली का जादू आज भी।
रहा है.फिल्म 5 अगस्त 1960 को परदे पर आई थी और इसे तैयार करने में कुल एक करोड़ पांच लाख रुपये खर्च हुए थे। आपको जानकर ताज्जुब होगा के फिल्म के निर्देशक के. आसिफ ने शूटिंग के लिए तैयार किए गए शीशमहल पर ही 10 लाख रुपए खर्च कर डाले थे। फिल्म के लोकप्रिय गीत 'जब  प्यार किया तो डरना क्या ' का फिल्मांकन इसी महल में किया गया था और उन दिनों फिल्म में पूंजी लगाने वाले शापूरजी पालोनजी दिवालिया होने की स्थिति में आ गए थे।'मुगले आजम' में सलीम की भूमिका निभाने वाले दिलीप कुमार के मुताबिक फिल्म को तैयार होने में पूरे सात वर्ष लगे और इसका प्रीमियर मुंबई के मराठा मंदिर सिनेमा घर में हुआ था। उस जमाने में फिल्म को देश भर के 150 सिनेमा घरों में एक साथ प्रदर्शित किया गया था, जो अपने-आप में एक रिकार्ड था।आसिफ ने पहली बार इस फिल्म के निर्माण की योजना वर्ष 1944 में बनाई थी और चंद्रमोहन को अकबर, सप्रू को सलीम और नरगिस को अनारकली की भूमिका के लिए चुना था, लेकिन योजना बीच में ही रोक दी गई। दूसरी बार वर्ष 1953 में इस फिल्म पर काम शुरू किया गया, जिसमें पृथ्वीराज कपूर, दिलीप कुमार और मधुबाला क्रमश: अकबर, सलीम और अनारकली की भूमिका के लिए पसंद किए गए.
उल्लेखनीय है कि आसिफ ने इस फिल्म को हिन्दी, तमिल और अंग्रेजी भाषा में बनाने की योजना तैयार की थी, लेकिन तमिल भाषा में प्रदर्शित फिल्म के बॉक्स ऑफिस पर असफल होने के बाद अंग्रेजी भाषा में प्रदर्शित करने का विचार छोड़ दिया गया।
भारतीय सिनेमा की पहली सिनेमास्कोप फिल्म "कागज के फूल" थी। 1959 में गुरू दत्त के निर्देशन में बनी इस ब्लैक एंड व्हाइट फिल्म के लीड एक्टर भी खुद गुरू दत्त थे, जबकि उनके अपोजिट वहीदा रहमान थीं। माना जाता है कि यह फिल्म गुरूदत्त की असल जिंदगी से प्रेरित थी। हालांकि यह बॉक्स ऑफिस पर कुछ खास कमाल नहीं दिखा पाई, लेकिन इसका नाम सिनेमा के क्लासिक फिल्मों की लिस्ट में शामिल है।  नाइल में लखविंदर सिंह की भवरी, अनुराग शर्मा की स्पीकिंग स्टोन, शाजिया श्रीवास्तव की दो पहर, इटली के लोरेंजो गोरेनरी की सोनिया ज स्टोरी, पूजा मक्कड़ की पश्चाताप की पूर्णाहुति सहित कुल इकत्तीस फिल्मों का प्रदर्शन हुआ.
आलम आरा और भारतीय सिनेमा
लेखक पत्रकार शिवानन्द कामडे द्वारा चेंबर भवन में भारतीय सिनेमा की पहली बोलती फिल्म आलम आरा पर बहुत महत्वपूर्ण जानकारियाँ दी गई. सिनेमा पर आठ पुस्तकों सहित कुल सत्ताईस किताबें लिख चुके कामड़े छत्तीसगढ़ के रहने वाले हैं और आलम आरा पर उनकी लिखी पुस्तक चर्चित रही है. कामड़े आज अपनी वार्ता में इस पहली बोलती फिल्म की कथावस्तु, इसके गीत-संगीत और गायकों के नाम आदि की विस्तृत जानकारी दी.इस फिल्म के ऐतिहासिक प्रदर्शन को याद करते हुए कामडे ने बताया कि इम्पीरियल कंपनी की यह फिल्म मुम्बई के गिरगांव स्थित मेजेस्टिक सिनेमा में दोपहर तीन बजे हुआ. मुम्बई के तत्कालीन गवर्नर ने इसका उदघाटन किया.

भारतीय सिनेमा के सौ वर्ष
चन्द्रमहल में वरिष्ठ लेखक एवं स्तंभकार जयप्रकाश चौकसे, इला अरुण, प्रेम चोपड़ा एवं प्रसून सिन्हा भारतीय सिनेमा के सौ वर्ष पर बात करने के लिए बैठे. जयप्रकाश चौकसे ने सिनेमा के अविष्कार से लेकर मूक फिल्मों, बोलती फिल्मों , पौराणिक कथाओं , देशभक्ति की फिल्मों से लेकर आज के सिनेमा तक की यात्रा को सविस्तार बताया एवं सिनेमा से जुडी कई रोचक जानकारियाँ भी दी. चौकसे ने कहा कि तीन घंटे की फिल्म हमारा अपना आविष्कार है और बीच में अपनी खाने-पीने की परंपरागत आदत को देखते हुए हमने ही फिल्म के बीच इंटरवल का कंसेप्ट पैदा किया.उनका कहना था कि हर देश का सिनेमा वैसा ही होता है जैसा वहाँ का खाना होता है. उन्होंने बताया कि हिन्दुस्तानी सिनेमा पर महात्मा गांधी का प्रभाव शुरू से रहा है और यह एक बड़ी सच्चाई है कि समाज ने भले ही गांधी को भुला दिया हो पर सिनेमा ने सौ साल तक आज भी गांधी को जिंदा रखा है. हिमांशु राय की अछूत कन्या से लेकर हाल ही दो साल पहले ढाई सौ करोड़ की कमाई करने वाली थ्री इडियट तक गांधी के विचारों का ही स्पष्ट प्रभाव है. चौकसे ने एक अन्य रोचक जानकारी देते हुए कहा कि हिमांशु राय ने अपनी शुरूआती तीन फिल्मों की शूटिंग १९२५-१९२७ के बीच जयपुर में की. देविका रानी भी न्यू थियेटर से जुडी हुई थी जो गुरुदेव रवीन्द्र नाथ ठाकुर की बहन की लड़की है. गुरुदेव खुद न्यू थियेटर के बोर्ड ऑफ डाइरेक्टर में शामिल थे. चरित्र अभिनेता प्रेम चौपडा ने कहा कि अभिनेता का एक ही उद्देश्य होता है धर्म, जाति, सम्प्रदाय से ऊपर उठकर सिर्फ़ अभिनय करना. उनका मकसद हमेशा दर्शकों की ज्यादा से ज्यादा मौहब्बत पाना और देना ही मकसद रहता है. उन्होंने कहा कि सिनेमा को उद्योग का दर्ज़ा भले ही मिल गया है पर सरकारी सहयोग आज भी नहीं के बराबर है. सरकार सिनेमा पर कई तरह के कर लगाती है. कलाकारों पर सर्विस टेक्स लगाया जाता है. पाइरेसी पर सरकार का कोई नियंत्रण नहीं है. इधर अभिव्यक्ति की पूरी आज़ादी भी नहीं है. गायिका इला अरुण ने फिल्म संगीत एवं लोक तत्व पर अपने विचार रखे.

डिज़िटल फिल्म डिस्ट्रीब्यूशन
नए निर्माताओं के लिए प्रोड्यूसर मीट के तहत डिज़िटल फिल्म डिस्ट्रीब्यूशन पर एक सेमिनार भी चेंबर भवन में हुई. जिसमें प्रसून सिन्हा, बी.बी. नागपाल व समीर मोदी ने फिल्म निर्माण में परेशानियां, सरकारी सहयोग में कठिनाई एवं इंटरनेट पर इ–डिस्ट्रीब्यूशन पर अपने अनुभव एवं नई जानकारियाँ दी.

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