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हनुमानगढ़ में सत्ता की राजनीति पर हमेशा से ही दो घरानों का वर्चस्व



अनिल जांदू:
हनुमानगढ़ में सत्ता की राजनीति पर हमेशा से ही दो घरानों का वर्चस्व रहा है। कुनबे की इस राजनीति को नई पीढ़ी ने भी सहजता से लेना भी शुरू कर दिया है। मानो वे बाप-दादा की तरह इसके अभ्यस्त हो चले हैं। आखिर हनुमानगढ के लोकतंत्र में ये कुनबावाद कब तक हावी रहेगा और इससे कभी निजात मिलेगी भी या नहीं ? क्या मेरे शहर का लोकतंत्र जमीनी संघर्षों, सामाजिक सरोकारों और नेतृत्व कौशल को परखने के बजाय परिवार केंद्रित मोहवादी राजनीति का शिकार बन कर रह जाएगा? ये परिवार पिछले कई दशकों से हनुमानगढ की राजनीति में वंशवाद के बड़े खिलाड़ी परिवार बने हुए हैं। मौजूदा सत्ता में काम करवाने वालो की अग्रिम पंक्ति पर नजर डालें। तो ऐसा लगता है कि वो रिश्तेदारों से भरी पड़ी है। प्रोत्साहन को खूंटी पर टांग अपनी अगली पीढ़ी तैयार करने में इन नेताओं ने कोई कसर नहीं छोड़ी ? अचरज होता है मुझें जब सबसे बड़े लोकतंत्र का जोरशोर से ढोल बजाया जाता है, चुनाव होते हैं तो लोकतंत्र के महान उत्सव के जैकारे लगने लगते हैं लेकिन बारीकी से देखने पर आप पाते हैं कि ये तो एक तरह से राजे रजवाड़ों की ही कोई प्रतियोगिता सरीखी हो रही है। चुनाव जीतते हैं तो राजतिलक सरीखा हो जाता है। हारते हैं तो हाथ जोड़कर निकल जाते है। वोटर युवा हो या बुज़ुर्ग, उसे इस बात से फर्क नहीं पड़ता कि वो भाजपा या कांग्रेस को वोट दे रहा हैं या कुनबे को या किसी व्यक्ति की राजनैतिक क्षमता को तौलकर। वे जैसे लीक वाली परिपाटी को ही निभाते जा रहे हैं। लेकिन जिले में लोकतंत्र के मुकम्मल विकास के लिए ये रवैया घातक हो सकता है ?

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