महारावल चैतन्य राज सिंह ने की शाही गणगौर की विधिवत पूजा ,दशहरा चौक दर्शनार्थियों की भीड़ उमड़ी

 महारावल चैतन्य राज सिंह ने की  शाही गणगौर की विधिवत  पूजा ,दशहरा चौक दर्शनार्थियों की भीड़ उमड़ी 


जैसलमेर   चै


त्र शुक्ल चतुर्थी को जैसलमेर राजपरिवार गणगौर की पूजा और शाही सवारी निकालता है. इस बार भी शाही गणगौर की सवारी नहीं निकाली गई. हालांकि उस परम्परा को लोगों ने आज याद किया. सोनारदुर्ग के त्रिपोलिया कक्ष में मंगलवार शाम पांच बजे गौर माता का पूर्व महारावल चेतन्यराज सिंह द्वारा विधि विधान से पूजन किया गया. गणगौर पूजन के समय महारावल द्वारा मां गणगौर की आरती की गई.पाट पुरोहित हरिवल्ल्भ गोपा के सानिध्य में धुर्व महाराज ,नन्द किशोर श्रीमाली और ओम प्रकाश सेवक द्वारा विधिवत मंत्रोचारण कर पूजन कराया ,महारावल ने जैसलमेर में चंहुमुखी  विकास और  कामना की ,इसा अवसर पर चंद्रप्रकाश श्रीपत ,सूर्य प्रकाश गोपा ,गिरधर मल्होत्रा ,साबिर अली ,डीप सिंह नरपत सिंह ,,आँखे सिंह ,तनेराव सिंह ,गंभीर सिंह ,मोड़ सिंह ,बनने सिंह और श्याम सिंह भायल मौजूद थे ,


माता के दर्शन के लिए उमड़ी भीड़

इस दौरान राज परिवार के सदस्यों सहित समाज के प्रबुद्ध जन भी मौजूद रहें. वहीं पूजन के बाद गणगौर को दुर्ग स्थित दशहरा चौक के चामुंडा माता मंदिर के पास लाया गया. जहां जिलेवासियों ने माता के दर्शन कर कुशलक्षेम की प्रार्थना कर आशीर्वाद लिया. जैसलमेर शहर में गणगौर के तीज और चौथ पर्व की धूम देखने को मिली. सोनार दुर्ग के राजमहल में पूर्व महारावल चैतन्यराज सिंह द्वारा शाही गवर का पूजन के पश्चात गवर माता के दर्शन के लिए भीड़ लग गई.


गवर माता को उठाया सिर पर


एक महिला सिर पर गवर माता को उठाकर राजमहल से बाहर लेकर आई, यह भी एक अनूठी परम्परा है. पहले पूरे रास्ते में महिला माता की प्रतिमा को लेकर चलती थी. जिसके बाद दुर्ग के दशहरा चौक में गवर माता का दरबार सजाया गया. गवर माता का दर्शन करने के लिए महिलाओं बालिकाओं की भीड़ उमड़ पड़ी.


 बिना ईसर के ही निकलती है सवारी


एक बार जैसलमेर के राज परिवार में विवाह के अवसर पर शादी के बाद दूल्हे पर स्वर्ण मुद्राओं की घोल कर उसे चंवरी में उछाला गया था. यह बीकानेर के शासकों को अच्छा नहीं लगा. उस समय तो वह कुछ नहीं बोलें लेकिन जब बीकानेर के लोगों को पता चला कि जैसलमेर की गणगौर की सवारी सबसे बेहतरीन है, तब उन्होंने ईश्वर व गवर की विशाल प्रतिमा को लूटने का प्रयास किया. बीकानेर के लोगों ने गणगौर मेले के अवसर पर गड़ीसर जाती गवर ईसर की सवारी पर अचानक धावा बोल दिया. जैसलमेर के लोग लड़े उन्होंने गवर को तो बचा लिया.


लेकिन ईसर की प्रतिमा को ले जाने में बीकानेर के लोग सफल हो गए. तब से जैसलमेर की गवर आज तक बिना ईसर के अकेली है और गणगौर पर शोभायात्रा में गवर की सवारी बिना ईसर के ही निकलती है. हालांकि राजपरिवार में लम्बे  समय से यह सवारी नहीं निकली है.


जैसलमेर में होती थी लूटपाट


कई वर्षो पूर्व रियासत कालीन समय से ही जैसलमेर में गणगौर की सवारी बड़े धूमधाम दुर्ग से निकलती थी. इतिहासकारों का कहना है कि रियासतकाल में राजपूताना कई रजवाड़ों में बंटा हुआ था. लोग परस्पर अहम ईर्ष्या भाव भी रखते थे. इसी भाव के चलते एक दूसरे के राज्यों में लूटपाट करते थे. इसी बीच इतिहास की कुछ घटनाओं के अनुसार बीकानेर के शासकों ने जैसलमेर पर धावा बोलने की फिराक में रहे और जैसलमेर क्षेत्र को लूटने लगे. जैसलमेर के लोग भी बीकानेर के पशुओं का चुराकर लाने की लूटपाट होती रहती थी.


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