नवरात्री विशेष आस्था का केंद्र ; सबसे ऊँचे पहाड़ पर हे नभ डूंगर माता (ब्रह्मचारिणी माता) का मंदिर ,सिंधु घाटी सभ्यता की झलक
नवरात्री विशेष
आस्था का केंद्र ; सबसे ऊँचे पहाड़ पर हे नभ डूंगर माता (ब्रह्मचारिणी माता) का मंदिर ,सिंधु घाटी सभ्यता की झलक
चन्दन सिंह भाटी
जैसलमेर जैसलमेर राजशाही परिवार शक्ति उपासक रहे हें ,जैसलमेर में नौ देवियों के स्थान हें।जो अलग अलग स्थानों पर स्थापित हें.जैसलमेर वासियों की इन शक्ति स्थलों के प्रति असीम आस्था हें।
जैसलमेर से कोई पचास किलोमीटर डेढा और खाभा से तीन किलोमीटर उतर में ऊँची पहाड़ी जिसे नभ डूंगर कहा जाता है पर नाभिया माता (ब्रह्मचारिणी माता स्वरूप) का मंदिर हें। यहाँ महिषासुर मर्दिनी के स्वरुप की विशाल प्रतिमा बनी हुई हें। इन मंदिर के बाहर एक विशाल त्रिशूल स्थित हें ।।
खाभा गाँव की ऊपर पहाड़ी पर खाभा फोर्ट में महिषासुर मर्दिनी की विशाल मूर्ति स्थापित हें। यह मुर्तिया अति प्राचीन और भव्य रूप में हें। नभ डूंगर मंदिर के पास एक छोटा सा कोठा बना हें जिसमे थाले बने हें ,थाले इस बात के साक्षी हें की यहाँ कुल देवी माँ आवड के स्वरुप की पूजा होती हें। नभ डूंगर के दी और काल भैरव की गुफा हें ,जो देखने लायक हें। नभ डूंगर के दर्शन करने वालो का ताँता लगा रहता हें। इसे दर्शनीयपर्यटक स्थल के रूप में विकसित किया जा रहा हें,
खाभा के नामकरण के पहले इसका नाम जोमलसर एवं भावनगर था । जोमालसर एक कुप का नाम है , जहां पहले जमींदार पल ( जोमाल ) रहते थे । यह कूप भी इन्हीका बनाया हुआ था , इसी कारण इसका नाम जोमालसर पड़ा । खाभा यहां के खड़ीन का नाम है । खाभा के ग्राम का एक अन्य नाम भावनगर भी मिलता है । इस क्षेत्र के लोक गीतों में भावनगर का उल्लेख आता है । जैसलमेर की तवारीख के अनुसार पल जाति के गोयलो ने अपनी कन्या पालीवालों को व्याह कर उन्हें खाभा दहेज में दे दिया था । दहेज देने वाले पालीवाल ब्राह्मण का नाम नेहड़ा था ।
किसी समय यह नगर जैसलमेर राज्य का सबसे बड़ा परगना था । जब हम पहाडी पर चढ़कर इस नगर की भव्यता को निहारते हैं तो पता चलता है कि सिन्धुवासी यहां आकर बसे थे । सिन्धु घाटी में प्राप्त मकानों की तरह बने हुए यहाँ के मकान , गलियां . छतरियां हमारे प्राचीन इतिहास और उच्च कोटि की संस्कृति का स्मरण कराते हैं । जब वर्षा हो जाती है तब तो यहां का दृश्य निराला ही होता है । नभ नामक डूंगर पर देवी का मन्दिर बना हुआ है । डेढ ,खाभिया एवं खाभा का विशाल खड़ीन एक स्वर्गीय आनन्द की अनुभूति कराता है । इस ग्राम में विशाल मन्दिर है , गली - गली में छतरियां हैं , चारों दिशाओं में हनुमान की मूर्तियां हैं तथा कोट में देवी का मन्दिर है । अभी यहां सोढा पंवार राजपूत आकर रहे हैं ।
यह क्षेत्र पालीवालों के 84 खेड़ों का मुख्य नगर था । यहाँ के मकानों की संख्या को देखते हुए लगता है कि किसी समय यह नगर जैसलमेर से भी बड़ा था । नगर में मकानों को इस तरह चतुराई से पंक्तिबद्ध बनाया गया है कि उनमें नगर की चारदीवारी स्वतः ही बन गई है । अनजान व्यक्ति एक बार जिस बस्ती में घुस जाता है तो वहां से वह वापस नहीं आ सकता । यहाँ के मकान विशाल
हैं , जो संयुक्त परिवारप्रणाली के प्रतीक कहे जा सकते हैं । इस क्षेत्र में पालीवाल , हजूरी ,सुनार , कुम्हार आदि कई जातियों के लोग रहते थे । यहाँ पर बुज की भाड़ी व झील 25 मील के फैलाव में स्थित है। जो काक नदी के आने पर भर जाती है, उससे हजारों मन गेहू और चना पैदा होता है । भोटार झील भी पास में स्थित है , जहां शिव महादेव का प्राचीन मन्दिर है । रघुनाथसर, उदासर व उधमसर तालाब के अलावा यहां के पाट में बहुत सी बेरिया बनी हुई है । नभ डूंगर के पहाड़ पर कालका देवी का भव्य मन्दिर है तथा स्वामी जुंधलीनाथ की प्राचीन गुफा है । खाभा पहाड़ी पर महिषासुरमर्दिनी का मन्दिर बना हुआ है ।
व्यापारिक केन्द्र
यह नगर सिन्ध से होने वाले व्यापार का मुख्य केन्द्र था । यहाँ के पालीवाल ब्राह्मण बड़े - बड़े व्यापारी थे । यहाँ की खानों से रोज हजारों मन माल ऊंटों की कतारों द्वारा लाया ले जाया जाता था । यहाँ अमरकोट एवं सिन्ध के व्यापारी आते जाते थे । यहां से जैसलमेर को माल जाता था ,क्योंकि पालीवाल समृद्ध व्यापारी थे ।
खाब खूब फब्यो , हरजायो हरि मन्दिरो ।
कोट बजारों सन्यो , रावल राजधानी लगी । ।
उपर्युक्त दोहा खाभा की समृद्धि , हराजल पालीवालों की धर्मप्रियता एवं समृद्ध व्यापार के साथ - साथ राजधानी की श्रेष्ठता का प्रतीक है ।पालीवालों के इतिहास के अनुसार यहां छः तालाब , पांच सती के स्थान ,अस्सी चबूतरे , एक मन्दिर , तीन जुझार , पांच उजाणे की चौकियां तथा सवा सौ देवलियां बनी हुई थीं ।
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