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बाड़मेर। पाप करने की मन से सोचना भी पाप करने के बराबर ही है - साध्वी सुरंजनाश्री



रिपोर्ट:- चन्द्रप्रकाश बी.छाजेड़ / बाड़मेर



बाड़मेर। एक व्यक्ति आम चौराहे पर खड़ा है उसे इस दुनिया में कई व्यक्ति हंसते नजर आ रहे है, कई व्यक्ति रोते नजर आ रहे है, कोई अमृतपान कर रहा है तो कोई विश का पान कर रहा है लेकिन उस व्यक्ति को यह समझ नहीं आ रहा है कि वो इस दुनिया में किसी मोड़ पर आगे बढ़े जहां उसके जीवन में सुख, आनंद व षांति की प्राप्ति हो, दुनिया उस पर अंगुली न उठाये। वो निर्णय नही ले पा रहा है कि उसके द्वारा क्या करने पर पुण्य की प्राप्ति होगी ओर क्या करने पर उसे सुख की प्राप्ति होगी यही स्थिति आज हर व्यक्ति की बनी हुई है।

गुरूमां साध्वी सुरंजनाश्री महाराज ने अध्यात्ममय वर्शावास 2018 के अन्तर्गत जैन न्याति नोहरा में उपस्थित श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए कहा कि इस संसार में जन्म तीर्थंकरों ने लिया, सभी महापुरूश ने लिया है, जगत के साधु संतों ने लिया है ओर संसार में रहने वाले अनंत प्राणी जो धर्म के क्षेत्र पर चल रहे उन्होनें भी लिया जन्म लेना इतना महान नही है, जन्म लेने के साथ अपना कर्म क्या करता है वो महान होता है। व्यक्ति कभी जन्म से महान नही होता है, व्यक्ति कर्म से महान बनता है। आज किसी के साथ जो कुछ भी होता वो कर्माधानी है, कर्म के आधारित होता है। कर्म घड़ी के कांटे की तरह निर्धारित है। हमारा जीवन भी अपने कर्मो के आधीन ये मनुश्य जीवन मिला है ओर हम कर्मो के आधीन चल रहे है कभी सुख आता तो कभी दुःख आता है, कभी खुषियों की बौझार आ जाती है तो कभी दुःखों के पहाड़ आ जाते है ओर समझ नही पाते है कि कुछ समय पूर्व में हमारे घर में आनंद था ओर कुछ क्षण में ये दुःखों की घड़ियां कैसे गुजर आई। हम प्रतिदिन प्रतिक्रमण करते है लेकिन हमारा ध्यान कभी उन प्रतिक्रमण के षब्दों पर नही गया। हमारी प्रत्येक क्रिया का एक लक्ष्य, एक प्रणीधान, एक ध्येय ओर एक ही उद्देष्य होना चाहिए। अतिमुक्तक मुनि ने इरियावही सूत्र के मात्र दो षब्द पणग-दग-मट्टी के माध्यम से अपनी आत्मा को षुद्ध कर दिया लेकिन हम सालों-साल से इसका पाठ कर रहे है लेकिन हमारी आत्मषुद्धि नही हुई।


साध्वी ने कहा कि हम सुबह से षाम तक अपना समय अपने षरीर को सजाने व संवारने में लगा देते है लेकिन ये षरीर एक दिन षमसान का मेहमान बनने वाला है। षरीर को षुद्ध करने के लिए उनके उपक्रम है लेकिन आत्मषुद्धि के लिए हम किसी भी उपक्रम का उपयोग नही करते है। व्यक्ति डगले ओर पगले प्रतिक्षण पाप क्रियाएं करता जा रहा है। हम हमारे षरीर पर समय का व्यय, वस्तु का व्यय, विचारों का व्यय करते है लेकिन षुद्धता के नाम पर हमें कुछ नही मिलता है क्योंकि षरीर का नाम ही अषुद्धता है। इसलिए ज्ञानियों ने अठारह पाप स्थानक की संवेदना बताई है। पाप को यदि हम एक उपमा देना चाहे तो हम दे सकते है कि पाप उस गुटखे की तरह है जो चखने में स्वादिश्ट है किंतु परिणाम में दुर्गति की भेंट करना है। उस मनपंसद किंतु आत्मा के लिए त्रासदायक बनते हुए पाप की ताकत को कैसे तोड़ा जाए , उन पापों से कैसे दूर हो इनकी जानकारी अर्थात् पाप गर्हा की यात्रा का नाम है अठारह पाप स्थानक भाव आलोचना। प्रणातिपात, मृशावाद, अदतादान, मैथुन, परिग्रह, क्रोध, मान, माया, लोभ, राग-द्वेश, अव्यख्यान, पैषुन्य, रति-अरति, पर-परिवाद, माया-मृशावाद व मिथ्यात्व षल्य इन अठारह पाप स्थानक का मनुश्य प्रतिक्षण सेवन करता है तथा मन प्रति इन अठारह पापों के प्रति कितना भारी बन चुका है। संसारी व्यक्ति की सबसे बड़ी भ्रांति यही रहती है कि मुझे कभी न कभी सुख मिलेगा, चाहे कितना भी पाप कर लूं , किसी भी तरह से पैसे कमा लूं, कैसे भी घर की व्यवस्था कर लूं लेकिन मुझे पीछे वाली जिन्दगी में अवष्य सुख की प्राप्ति होगी ओर वो इसी भ्रांति में दौड़ा जाता है और संसार के अठारह पापस्थानों का सेवन करता रहता है लेकिन जिन्दगी का कोई भरोसा नही, जिन्दगी तो पानी के परकोटे की तरह है, जिन्दगी कांच की षीषी की तरह है, जिन्दगी एक फूल की तरह है और जिन्दगी एक चलते हवा के झौंका की तरह है, झौंका आया ओर देखते ही देखते विलीन हो गया ओर हम उसे पकड़ भी नही पायेगे ओर ही उसे समझ पायेगें क्योंकि बचपन हमारा नासमझी में चला गया ओर जवानी हमारी समय नही इसमें चला गया ओर बुढ़ापे में कहेगें अब इस षरीर में धर्म करने की षक्ति नही है। पाप करना बुरा नही है लेकिन पाप करने के बाद पष्चाताप न करना बुरा है। आज दिन तक हमने संसार से राग किया है लेकिन अब धर्म का मर्म समझ कर षासन से राग करके संसार के राग को भस्मीभूत कर वीतराग दषा प्राप्त करना है। आज तक की जिन्दगी में हमने अपनी आत्मा रूपी सोने की तिजोरी में पाप रूपी कंकर भरे है लेकिन अब से हमें निष्चय करना है कि अब हम पाप नही करेगें। सुरंजना श्री चातुर्मास समिति के मिडिया प्रभारी चन्द्रप्रकाष छाजेड़ व अषोक भूणिया ने बताया कि रविवार को अठारह पाप स्थानक संवेदना के भव्य कार्यक्रम में साध्वीवर्या की निश्रा में श्रद्धालुओं ने अपने पापों को याद करके उसका पक्षालन किया। दोपहर में बालक-बालिकाओं के संस्कार षिविर का आयोजन किया जिसमें बढ़-चढ़कर बालक-बालिकाओं ने भाग लिया। संघ प्रभावना का लाभ किषनलाल तगामल मालू झिझनीयाली वालों ने लिया।




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