गिरफ्तारी से पहले नोटिस नहीं दिया तो अवमानना

जयपुर। दहेज उत्पीड़न समेत सात साल से कम सजा वाले मामलों में सीधे गिरफ्तारी नहीं होगी। पुलिस को पहले जवाब का मौका देने के लिए आरोपित को नोटिस भेजना होगा।

ऎसा नहीं करने पर अनुसंधान अधिकारी को विभागीय कार्रवाई के साथ हाईकोर्ट की अवमानना भी भुगतनी पड़ेगी। यही नहीं रिमांड देते समय लापरवाही सामने आने पर मजिस्ट्रेट को भी कार्रवाई।

राज्य सरकार ने पुलिस महानिदेशक, हाईकोर्ट रजिस्ट्रार जनरल व लोक अभियोजकों से इस बारे में सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन कराने को कहा है। सुप्रीम कोर्ट ने जुलाई 2014 में दहेज प्रताड़ना सहित सात साल तक की सजा वाले मामलों में गिरफ्तारी से पहले नोटिस देने का आदेश दिया था।
not given notice before arrest then contempt

सुप्रीम कोर्ट के आदेश

दहेज उत्पीड़न मामलों में पुलिस गिरफ्तारी से पहले नोटिस दे।
एफआईआर के दो सप्ताह में नोटिस जारी किए जाएं। गिरफ्तारी के लिए मजिस्ट्रेट को कारण बताने होंगे।

मजिस्ट्रेट को रिमांड देने के कारणों का खुलासा करना होगा।
गिरफ्तारी आवश्यक नहीं तो दो सप्ताह में मजिस्ट्रेट को बताएं।

पुलिस अधीक्षक दो सप्ताह की समय सीमा बढ़ा सकते हैं।
पालना नहीं होने पर अनुसंधान अधिकारी पर विभागीय कार्रवाई

पुलिस के खिलाफ हाईकोर्ट में अवमानना याचिका।
बिना कारण रिमांड पर मजिस्ट्रेट के खिलाफ हाईकोर्ट कार्रवाई करे।

इसका यह होगा फायदा

पुलिस की मनमानी नहीं चलेगी
अदालतों में अग्रिम जमानत प्रार्थना पत्र पेश नहीं करने होंगे
रिमांड देते समय मजिस्ट्रेट सावधान रहेंगे

 

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