गुरुवार, 2 जनवरी 2014

यह ऐतिहासिक गुजरात आज से नहीं, सदियों से है


यह ऐतिहासिक गुजरात आज से नहीं, सदियों से है

गुजरात की समृद्धता आधुनिक नहीं, ऐतिहासिक है। इस इलाके ने बहुत उतार-चढ़ाव देखे हैं। सैन्य, राजनीतिक, युद्ध, भूकंप, समुद्र का अंगड़ाई लेना और गुस्सा दिखाना, रेगिस्तान से लेकर अब हो रही जबरदस्त खुदाई (खनन) तक सब कुछ।

मुझे नहीं लगता कि हमारे सामान्य समाज की इस तरह के उतार-चढ़ाव को जानने और समझने में बहुत रुचि रही है। मुझे समझ नहीं आता कि हमारा अध्यात्म रहस्यवाद के खिलाफ क्यों होता है। एक समय पर एक शहर में से एक बड़ी नदी बहती थी जिसने अपना रास्ता बदल लिया। नदी के रास्ते में इस बदलाव ने एक अर्थव्यवस्था को खत्म कर दिया।

कच्छ के उत्तर-पूर्व में लखपत का किला है। यह केवल एक किला नहीं है, बल्कि एक पूरा वाकया है। आज जब आप इस किले की तरफ जाने के लिए निकलते हैं तो कई किलोमीटर तक आपको कोई घनी बस्ती या बाजार या सेवा नजर नहीं आती।

बहरहाल, आपको लिग्नाइट की खदानें होने के बहुत से बोर्ड दिखाई देते हैं जिनसे यह पता चलता है कि गुजरात खनिज विकास निगम इस इलाके का मौजूदा सत्तादार है। इस किले के ठीक बाहर एक चाय की दुकान है। किले के भीतर हर रोज अपनी जिंदगी के लिए जूझते अब 51 परिवार रहते हैं, पर इतिहास तो कुछ और ही कहानी कहता है।

जानते हैं इसे लखपत क्यों कहते हैं? यह देश का सबसे समृद्ध बंदरगाह हुआ करता था। व्यापार का आलम यह था कि हर रोज इस स्थान पर 1 लाख कोड़ियों (तब की मुद्रा) का व्यापार होता था। इसी 1 लाख के कारण इसका नाम लखपत पड़ गया। लखपत मतलब लखपति परिवारों का गांव!

12 साल की उम्र में फकीर बने गौस मुहम्मद की समाधि यहां है। माना जाता है कि मक्का जाते समय और वापस लौटते समय गुरुनानक ने लखपत में रात्रि विश्राम किया था इसलिए यहां गुरुद्वारा भी है। यहां के ग्रंथी के मुताबिक लखपत का गुरुद्वारा पहला गुरुद्वारा है।

1805 में कच्छ के राजा के लोकप्रिय सेनापति जामदार फतेह मुहम्मद ने इसकी सिंध के आक्रमण से रक्षा करने के लिए लखपत का किला बनवाया जिसका परकोटा 7 किलोमीटर का है।

यहां कच्छ के विशाल रण से कोरी खाड़ी का मिलन होता है, तब सिंधु नदी यहां से बहा करती थी। यहां की जनसंख्या 5,000 हुआ करती थी जिनमें ज्यादातर सौदागर और हिन्दू होते थे। सिंधु नदी के किनारे पर कोटरी नामक स्थान था, जहां बड़ी नावें और जहाज आकर खड़े होते थे। यहां से ऊंटों पर अन्य साधनों से माल ढो-ढोकर थार तक पहुंचाया जाता था।

सोचिए आज जो रेगिस्तानी क्षेत्र है, वहां सबसे ज्यादा खेती धान की होती थी। वर्ष 1819 में कच्छ में आए जबरदस्त भूकंप ने सब कुछ बदल दिया। यहां जून 1819 के 7 दिनों में 36 भू-गर्भीय कंपन हुए। यहां से बहने वाले सिंधु नदी ने अपना रास्ता बदला दिया, एक प्राकृतिक बांध अल्लाहबंद का निर्माण हो गया और नदी सीधे समुद्र में जाकर मिलने लगी। सब कुछ तहस-नहस हो गया।

बताया जाता है कि ऐतिहासिक महत्त्व के मद्देनजर सरकार द्वारा इस क्षेत्र और लोगों के विकास के लिए राशि जारी की जाती रही, पर भ्रष्टाचार लखपत के वजूद को मिटाने की मुहिम में सफल साबित हुआ। अब यहां कोई नहीं आता है।

8 पीढ़ियों से रह रहे लोग अपनी इन जड़ों को छोड़ना नहीं चाहते हैं। वे मानते हैं कि समृद्धता और संपन्नता हमेशा नहीं रहती। हम यदि लखपत को छोड़ भी देंगे तो हमारी जिंदगी नहीं बदलेगी। अब हमें अपना नया भविष्य गढ़ना है।

कच्छ में ही 17वीं शताब्दी में निर्मित हुआ मुंद्रा बंदरगाह भी है। निजीकरण के जरिए आर्थिक विकास की नीतियों के तहत यह बंदरगाह 10 साल पहले एक निजी कंपनी समूह अडानी को दे दिया गया। उसने यहां पर्यावरण को खूब नुकसान पहुंचाया जिसके लिए उस पर 200 करोड़ रुपए का जुर्माना भी हुआ। बहरहाल, यह बंदरगाह एक समय में नमक और मसालों के व्यापार के लिए बेहद प्रसिद्ध था।

यहां रहने वाले खारवा जाति के लोग कुशल जहाज चालक होते थे इसलिए यह बंदरगाह भी बहुत सफल रहा। इन तीनों उदाहरणों को देखा जाए तो आर्थिक संपन्नता के साथ यहां धार्मिक और आध्यात्मिक सौहार्द भी फैला हुआ नजर आता है। मुंद्रा में भी शाह बुखारी पीर की दरगाह है। संत दरिया पीर के बारे में कहा जाता है कि वे मछुआरों की रक्षा करते थे और 17वीं सदी में यहां आए थे।

गुजरात में कच्छ के दूसरे कोने में है मांडवी, एक समुद्र तट और एक शहर! थोड़ा विस्तार से बताता हूं। आज जिस गुजरात राज्य को हम बहुत समृद्ध मानते हैं और सोचते हैं कि ये पिछले कुछ वर्षों में विकसित हुआ है, पर सच यह है कि समृद्धता तो यहां 400 साल पहले से आना शुरू हो गई थी।

वहां मांडवी में कच्छ के रजा खेंगारजी ने वर्ष 1574 में विशालकाय बंदरगाह बनवाया था। 1581 में नगर की स्थापना हुई। इस बंदरगाह की क्षमता 400 जहाजों की थी। मुंबई से पहले यह बंदरगाह बन गया था। आजकल भारत का भुगतान संतुलन बिगड़ा हुआ है यानी निर्यात कम होता है और आयात ज्यादा, पर 100 सालों तक मांडवी से होने वाले व्यापार में आयात से 4 गुना ज्यादा निर्यात होता था।

यहां से पूरी अफ्रीका, फारस की खाड़ी, मालाबार, पूर्वी एशिया से व्यापार के लिए जहाज अरब सागर के इस बंदरगाह पर आते थे। यहां के समुद्र को काला समुद्र या ब्लैक-सी भी कहा जाता है, क्योंकि यहां मिलने वाली बारीक मिट्टीनुमा रेत का रंग काला होता है। पहले-पहल तो आपको लगेगा कि- हें! यहां तो कीचड़ है, पर जब हम इसे स्पर्श करते हैं तब हमें यहां की संस्कृति, संपन्नता और वैभवशाली अतीत का अहसास होने लगता है।

इस यात्रा से मेरा यह विश्वास तो मजबूत हुआ कि इतिहास और अतीत को पलटकर जरूर देखना चाहिए। एक नए समाज को गढ़ने के लिए यह बहुत जरूरी है।

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