शनिवार, 4 फ़रवरी 2012

"खम्मा घणी, अन्नदाता मोटा है..."पद्मश्री साकर खां

"खम्मा घणी, अन्नदाता मोटा है..."
 
जैसलमेर। गुनगुनी धूप मे घर के बाहर वयोवद्ध लोक कलाकार और हाल में पद्म श्री से सम्मानित साकर खां जब कमायचे पर अपनी दिल की भावनाओ को संगीत की धुनो के रूप मे फिजां में बिखेरते हंै तो हमीरा गांव मे अनूठा समां बंध जाता है। जब साकर खां केसरिया बालम, आओ नी.. की धुने छेड़ते हैं तो उनका छोटा भाई पेपे खां शहनाई बजाकर उसके सुर मे सुर मिलाता है।

इसी बीच साकर खां के पोते जावेद व आजाद कमायचा व तबला लेकर वहां पहुंच जाते हैं और फिर जो माहौल बनता है वह सुनने वालों को अंदर तक झंकृत कर देता है। साकर खां को पद्मश्री मिलने से सरहदी जैसलमेर जिले का यह पूरा गांव उत्साहित है। लेकिन साकर खां गांव वालो के सम्मान और प्यार को सबसे बड़ा सम्मान मानते हैं। यह संवाददाता मंगलवार को जैसलमेर से 25 किमी दूर साकर खां के गांव हमीरा पहुुंचा तो जीवन के 75 बसंत पार कर चुके साकर खां मे अभी भी किशोर कलाकार की तरह कला के प्रति जज्बा व नया कुछ करने की हसरत देखने को मिली।

सब ऊपर वाले की कृपा
देश का प्रतिषित सम्मान प्राप्त करने को साकर खां ऊपर वाले की कृपा बताते हैं। उन्होंने कहा खम्मा घणी, अन्नदाता मोटा है, म्हे तो धोराें री धरती मे पैदा हुआ..। आम की लकड़ी, शीशम के काष व हाथीदांत से तैयार होने वाले कमायचे को बजाने मे माहिर साकर खां के विवाह व रस्मो पर पेश किए जाने वाले तोनरिया, बनड़ा, घूमर, बरसाले रा मौसम, चौमासा, मूमल, मणियारा, सियालो, हालरिया का हर कोई दीवाना है। उन्हें कमायचे पर ट्रेन के चलने व घोड़े के दौड़ने की आवाज निकालने मे भी महारत हासिल है। वे इंदिरा गांधी के साथ रूस मे इंडिया फेस्टिवल मे जाने को यादगार दिन मानते हंै।

कई यात्राएं व सम्मान
देश-विदेश में थार के लोक संगीत की स्वर लहरियां बिखेरने वाले साकर खां 50 वर्ष से संगीत साधना से जुड़े है। पुरस्कारो की फेहरिस्त मे पद्मश्री व राज्यस्तरीय सम्मान के अलावा केन्द्रीय संगीत नाटक अकादमी, मध्यप्रदेश सरकार का प्रतिषित तुलसी अवार्ड, राजस्थान संगीत नाटक अकादमी का स्वर्ण जयंती सम्मान आदि शामिल हैं। वे फ्रांस, रूस, जिनेवा, बेल्जियम, जर्मनी, अमरीका, जापान, हांगकांग सहित कई देशो की यात्रा कर चुके हैं।

केवल खुशी मे ही शरीक
साकर खां अपनी कला को व्यावसायिक रूप नहीं देना चाहते। उन्होने बताया कि जब वह 11 साल के थे, तभी उनके पिता का देहांत हो गया। तब पिता की धरोहर कमायचा था। इसे बजाने में महारत हासिल की और गांव के लोगो की हौसला अफजाई के कारण उन्हे यह मुकाम मिला, इसलिए वे केवल उनकी खुशी के मौको पर ही अपनी कला पेश करते हैं। सैलानियो को खुश करने के लिए कला का प्रदर्शन उन्हे पसंद नहीं है।

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