नई दिल्ली. उन लोगों के लिए बुरी खबर है जो एजेंसियों द्वारा उनकी निजी जिंदगी में ताकाझांकी की शिकायत करते रहते हैं। विदेशों में जासूसी करने वाली भारत की खुफिया एजेंसी रॉ को यूपीए सरकार ने उन अधिकृत एजेंसियों की सूची में शामिल कर लिया है जो कानूनी तौर पर फोन कॉल, ईमेल समेत सभी तरह के इलेक्ट्रॉनिक संचार को इंटरसेप्ट कर सकती हैं। सरकार की यह अधिसूचना तत्काल प्रभाव से लागू हो गई है। 1967
1967 में रॉ की स्थापना के बाद इसके इतिहास में यह पहली बार है जब उसे विदेशों में अपनी जासूसी गतिविधियों के अलावा भारतीय नागरिकों की जासूसी करने की अनुमति दी गई है। वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों ने भास्कर/डीएनए को बताया कि यह अधिसूचना कुछ हफ्ते पहले जारी की गई। गृह मंत्रालय ने रॉ को उन आठ मान्यता प्राप्त कानून-व्यवस्था से जुड़ी एजेंसियों में शामिल किया है जिन्हें सुप्रीम कोर्ट ने कानूनी तौर पर बातचीत को पकडऩे के लिए अधिकृत किया है। लेकिन यह कदम सरकार के इरादों पर गंभीर सवाल उठाता है।
खासकर तब जब आईटी मंत्री कपिल सिब्बल ने सोशल मीडिया पर स्क्रीनिंग की योजना के संकेत दिए हैं। अधिसूचना के अनुसार रॉ अब सभी तरह के डाटा को पकडऩे के लिए इंटरनेशनल गेटवेज पर अपने कम्युनिकेशन इंटरसेप्शन उपकरण लगा सकती है। चाहे फिर वह भारत से विदेश में जाने वाली फोन कॉल हो या किसी भी अन्य तरह का इलेक्ट्रॉनिक डाटा हो, जिसमें ईमेल भी शामिल है।
प्रभावी निरीक्षण तंत्र के अभाव में सरकार का यह कदम निगरानी, निजता और नागरिक अधिकारों के हनन को लेकर गंभीर सवाल पैदा करता है। अमेरिका और ब्रिटेन जैसे देशों में सभी खुफिया एजेंसियां विभिन्न स्तरों पर सुरक्षा तंत्र के साथ ही संसद के नियमों से नियंत्रित होती हैं। ब्रिटेन में प्रधानमंत्री द्वारा चुना गया संसदीय दल सभी तरह की फोन टेपिंग और जासूसी गतिविधियों की समीक्षा करता है। अमेरिका में विदेशी निगरानी खुफिया कानून और सीनेट की एक संयुक्त समिति के जरिए जासूसी गतिविधियों पर नियंत्रण रखा जाता है।
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