1971 महाविजय की यादों का उजागरण
कोनार्क कोर में 'विजय दिवस' का जन प्रसिद्ध आत्मसमर्पण समारोह
एस डी गोस्वामी
1971 की प्रसिद्व विजय की सुखद यादें जिसने भारत को दक्षिण एािया की एक ताकत के रुप में हमोा के लिए उभारा है, भारतीय सेना के इतिहास में हमोा उजागर रहेगी। हमारी सेना ने अनेक कठिन, भीष्ण और प्रमुख लडा़इयाँ लडी़ और जीती जिसके फलस्वरुप वह माहूर जीत सिद्व हो सकी और यह सब हमारे जवानों की अदम्य साहस, और सर्वोच्च बलिदान के कारण ही सम्भव हो सका। इस अदम्य साहस और बलिदान की गाथा हमारे स्वतंत्र दो के इतिहास के सुनहरे अध्याय में से एक है, और इसकी आने वाली पीड़ी हमोा इसके आनन्द का अनुभव करेगी।
लौंगेवाला युद्ध में आर सी एल गनर द्वारा पाकिस्तान की 22वीें कैवलरी के टैंक टी59 को बरबाद करते हुए
छाछरों के दुमन, टैन पैरा कमाण्डो
लड़ाई का मोर्चा सिर्फ पूर्वी मोर्चे पर ही सीमित नहीं था बल्कि अनेक भीष्ण लड़ाईयाँ पिचमी सीमा खासकर रेगिस्तान में भी लड़ी गयी। लोंगेवाला की प्रसिद्व जंग 0405 दिसम्बर 1971 को अल्फा कम्पनी, 23 पंजाब द्वारा लड़ी गयी, जिससे बॉडर फिल्म प्रेरित है, और यह भारतीय सेना के जवानों के 1971 युद्ध के दौरान लड़े गये अभूतपूर्व युद्ध कौभाल को दार्ता है। चंद मुट्ठी भर जवानों ने पाकिस्तान की एक आर्मड रेजीमेन्ट और इन्फेन्टी्र बटालियन के हमले को ध्वस्त कर दिया और उसका मार्च रोक दिया। रेगिस्तान के हिस्सों में बिखरे क्षतिग्रस्त उनके टैंक, गाड़ियाँ और मृत सैनिकों की तस्वारें हमारे ताकत की क्षमता का जीता जागता सबूत है। इसी तरह 'पर्वत अली' युद्ध भी कोनार्क कोर की ही एक ब्रिगेड द्वारा लड़ा गया और यह भारतीय सेना के अदम्य साहस और निचय को दार्ता है। इस युद्ध में पाकिस्तानी सेना के एक महत्वपूर्ण मोर्चे पर विजय हासिल की तथा जिसे दुमनों ने इसे दुबारा हासिल करने के लिए तीन बार लगातार हमले भी किये जिसको भारतीय सेना ने बारबार विफल कर दिया तथा दुमन इसे हासिल करने में नाकाम रहा। दाम पैराूट कमाँडो बटालियन ने स्वर्गीय ब्रिगेडियर (तब लेफ्टिनेन्ट कर्नल) भवानी सिंह के नेतृत्व में छाछरों भाहर, पाकिस्तान के ठिकानों पर अकस्मात हमले बोले और यह पूरे विव में कमांडो बटालियन की क्षमता का एक उदाहरण स्वरुप बन चुका है। इन लगातार हमलों के कारणवा दुमन की रक्षात्मक प्रणाली की कड़ी कमजोर हुई और जिसके कारणवा अन्य लड़ाइयों में सफलताऐं हासिल हुई।
बोगरा की बरबादी
पूर्वी मोचों पर भी कोनार्क कोर की एक अन्य ब्रिगेड के सैनिकों ने अभूतपूर्व साहस और ट्टड निचय और वीरता का परिचय दिया, जब उन्होने पीरगंग, गोविन्दगड,़ ईच्छामती और कराटोया की लड़ाइयाँ जीतते हुए बोगरा भाहर पर कब्जा किया। बोगरा राहर एक छावनी शहर था जिसमें पाकिस्तान की 16 वीें इन्फेंटी्र डिवीजन और 205 इन्फेंटी ब्रिगेड स्थापित थी। दो दिओं से एक निर्भीक, समकालीन और तीब्र हमले को बोगा्र ब्रिगेड के सैनिकों ने दुमन को आत्मसमर्पण करने के लिए मजबूर कर दिया, यद्यपि उन्होने दुमन ने इस हमले का डटकर मुकाबला भी किया। बोगरा की लड़ाई में कुल मिलाकर पाकिस्तानी सेना के 54 अधिकारी, 556 सरदार साहिबान तथा 1613 सैनिकों को युद्व बन्धक बनाया गया।
कोनार्क कोर की स्थापना इस युद्व के बाद हुई और यह पूर्ण स्थापित है तथा अपने युद्व कार्यों को अंजाम देने के लिए सदैव तत्पर है। शांतिकाल में आकास्मिक स्थितयों को निपटने की तैयारी के लिए कठिन अभ्यास करती है और नई तकनीकें शामिल करने के लिए सदैव तत्पर है। भारतीय सेना 1971 की यादगार विजय को हर साल तरो ताजा करती है जब वह 16 दिसम्बर को हर बार विजय दिवस के रुप में मनाती है। इस बार विजय की चालीसवीं वर्षगाँठ की शुरुवात कोनार्क कोर में 16 दिसम्बर 2011 को एक सादे और शोक भरे पुष्पाजंली अर्पण समारोह के साथ आरम्भ हुई जिसमें एक जवान से लेकर जनरल महोदय ने कोनार्क भाहीद स्मारक पर पुष्पाजंली अर्पित की। उन शहीदों को याद किया गया जिन्होने राष्ट्र प्रहरों और क्षेत्रीय स्वलम्बता की रक्षा करते हुए अपने प्राण न्योछावर कर दिये तथा यह पुष्पाजंली अर्पण समारोह इतने बड़े बलिदान के लिए एक छोटी सी श्रद्वाजंली ही है। मेजर जनरल एस. कं.े रैना, जी. ओ. सी., जोधपुर सब एरिया, इस समारोह में एक प्रमुख उच्च अधिकारी प्रस्तुत थे। रेजीमेंटों के पाइप बैडों की देश भक्ती से भरी बजती हुई धुनों ने इस समारोह को एक शोक और यादों से भरे वातावरण में तबदील कर दिया जिसको देखने के लिए केन्द्रीय विद्यालय और आर्मी पब्लिक स्कूल के छात्र भी उपस्थित थे। कोनार्क कोर की हर रेजीमेंट में दोपहर को सभी सैनिकों के लिए बड़े खाने का आयोजन किया गया।
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें