दुर्दशा पर आंसू बहा रही है बावड़ी

दुर्दशा पर आंसू बहा रही है बावड़ी
समदड़ी। कस्बे के वाशिंदो की कभी प्यास बुझाने वाली एक मात्र प्राचीन बावड़ी अपनी दुर्दशा पर आंसू बहा रही है। सरकारी उपेक्षा के चलते यह बावड़ी अब धीरे धीरे विलुप्ति के कगार पर पहुंच गई है। गांव से कस्बे में बदले इसके वाशिंदों को मीठा पानी उपलब्ध करवाने के लिए कई वर्षो पहले गांव के चौक में बावड़ी का निर्माण करवाया गया था। इस कलात्मक बनी बावड़ी से पूर्व के वर्षो में यहां के रहवासी पानी सींचकर अपनी दैनिक जरूरतों को पूरा करते थे।

पूरी तरह से बावड़ी के सुरक्षित होने पर गांव की पनघट यही लगती थी। दिन भर सीढियों के सहारे बावड़ी मे उतर व यहां से पानी भरकर घर तक ले जाने के काम में महिलाएं जुटी रहती थी। बावड़ी की वजह से ही इस क्षेत्र का नाम बावड़ी चौक रखा गया, लेकिन इसके बाद गांव की अधिक बढ़ी आबादी व इसके कस्बे का रूप ले लेने पर पेयजल की व्यवस्था सरकार स्तर पर किए जाने से बावड़ी के अच्छे दिन ही फिर गए। तब से आज तक इस बावड़ी की ग्राम पंचायत व उपखंड प्रशासन द्वारा कोई सार संभाल नहीं ली जा रही है। ऎसे में अस्तित्व खोती बावड़ी अपनी दुर्दशा पर आठ आठ आंसू रो रही है।

संरक्षण की दरकार
बावड़ी के भीतर बने कुंए के ऊपर लगी छत्त व आस-पास की दीवारो का प्लास्टर उखड़ने लगा है। ऊपर की पटि्टयां टूटने के कगार पर पहुंच गई है। पिछले कई वर्षो से बिना किसी उपयोग के ताले मे बंद बावड़ी में पक्षियो द्वारा बनाए गए घौंसलों पर अब यह गंदगी के ढेर में बदल गई है। इस सबके बावजूद इसके जीर्णोद्धार को लेकर ग्राम पंचायत व उपखंड प्रशासन आंखे मूंदें बैठा है।

जीर्णोद्धार करवाएं
कस्बे की बावड़ी अति प्राचीन व कलात्मक है। इसके संरक्षण के लिए जीर्णोद्धार करवाया जाना चाहिए, जिससे कि प्राचीन संस्कृति जीवित रह सके।
सफी मोहम्मद रंगरेज ब्लॉक संगठन मंत्री कांग्रेस

विभाग को अवगत करवाया
बावड़ी के जीर्णोद्धार को लेकर पूर्व मे कई बार ग्राम पंचायत द्वारा पुरातन विभाग को पत्र लिखा गया है, लेकिन आज तक कोई कार्यवाही नहीं की गई है, जिससे बावड़ी अपना अस्तित्व खो रही है।
बाबूलाल परिहार सरपंच, समदड़ी

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