visfot.com - जाट लॉबी के सामने पस्त हुये गहलोत

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राजस्थान में बहुत जल्द किसी बड़े परिवर्तन की उम्मीद में नजर नहीं आ रही है। राष्ट्रपति को लेकर मंत्री अमीन खां ने एक बयान भर दिया था गहलोत ने आनन फानन में मंत्री का इस्तीफा ले लिया लेकिन भंवरी के मामले में गहलोत ने शुरू से ही चुप्पी साध रखी थी। रही सही कसर सीबीआई को जॉच सुपुर्द कर पूरी कर दी। भंवरी के मामले में धीरे धीरे जाट लॉबी ने जिस तरह से दबाब बनाया लगता है अब कांग्रेस और सरकार दोनों को ही कुछ करना मुश्किल हो गया है।

वुधवार को पदेश के लगभग हर छोटे बडे अखवार में एक विज्ञापन देखा गया। इतना ही नहीं जिला सस्करणों तक में इस विज्ञापन को बखूबी जगह मिली। शायद ऐसा पहली बार था कि प्रदेश के धाकड जाट नेता और विधानसभा अध्यक्ष रहे परसराम मदेरणा के जन्म दिन को अखवारों में विज्ञापन के साथ इतने बडे स्तर पर प्रचारित किया गया हों। इस विज्ञापन के पीछे का कारण साफ था। परसराम मदेरणा के बेटे महिपाल इन दिनों भंवर में फंसे हुये है। उसी भवर ने बाहर निकलने की कवायद के रूप में उन्होंने अपने पिता के जन्मदिन के का सहारा लिया। लगभग गुमशदगी में चले गये पिता को एक बार फिर से प्रदेश के लोगों के सामने लाया गया। किसान नेता,जाट नेता न जाने कौन कौन से जुमले उनके लिए लिखे गये। इतना ही पूरे महीने की खामोशी के बाद अपने अवास पर महिपाल ने आयोजन भी रखा।

इस पूरे मामले में कोर्ट की दखलंदाजी के बाद कुछ उम्मीदें बढी थी। मगर अब लगता है पूरा मामला ही रूटीन की तरह लोगों की जुबान से उतर गया है। ये अपने आप में बडी बात है कि एक महिला को एक महीने से अधिक हो गया है और प्रदेश सरकार और पुलिस के पास इस बात का कोई सबूत नहीं है कि वो इस दुनिया में है भी या नहीं। उधर सरकार है कि अपनी रफतार से अब रेगती नजर आने लग गई है।

राजस्थान की राजनीति में जाटों का अपना बर्चस्व है। कांग्रेस में जाट नेताओं की एक लम्बी फेहरिस्त है। ये सच है कि जाटों को कांग्रेस की ओर से कभी उतना बजन नहीं दिया गया है जितने के वो खुद को हकदार मानते रहते है। यही कारण है कि जाट मंत्री के उपर लगे लांछनों को भी पचाना कांग्रेस की मजबूरी है। इतना ही प्रदेश नेतृत्व भी पूरी तरह से जाटों के हाथ में ही है। ऐसे में जाट मंत्री के खिलाफ कुछ भी कदम उठाने से पहले सरकार और कांग्रेस पार्टी दोनों को ही आने वाले समय को ध्यान में रखना जरूरी है।
विपक्षी भाजपा भी लगभग जाटों के हाथों में है। पूर्व मुख्यमंत्री बसुंधरा के सिपाही उपाध्यक्ष दिगंबर सिंह जाटों में अपनी पहचान बना चुके है। ऐसे में उनका मदेरणा के घर जाकर ये कहना कि मामला जॉच में होने के कारण भाजपा इस पर कुछ भी कहना जरूरी नहीं समझ रही है। ये साफ करता है कि विपक्षी जाट लॉबी भी मदेरणा को लेकर कुछ भी कहना करना नहीं चाहती है। ऐसे में गहलोत के लिए एक ओर मामले को लंबा खीचकर मदेरणा को अंकुश में रखने का मौका मिल गया है तो कांग्रेस के लिए जाटों को अपनी ओर बनाये रखने का।

पिछले दिनों जोधपुर पहुंचे गहलोत की अगवानी करके मंत्री मदेरणा ने माहौल में नरमी के संकेत दिये थे। उसके बाद तो जाट नेताओं ने मुख्यमंत्री के कसीदे पढने शुरू कर दिये। राजनीति के गलियारों में मंत्री मंडल फेरबदल की चर्चा भले ही जारों से चल रही है। लेकिन हालात को देखकर लग नहीं रहा है कि कुछ भी बडा हो पाऐगा। आरोपी मंत्रियों का कद और जातिगत समीकरण ऐसा बैठ रहा है कि गहलोत के लिए कुछ भी करना आसान नहीं रहने वाला है। एक ओर धारीवाल पर कार्यवाही करते है तो अपना विष्वस्त सहयोगी खो देगें। महिपाल और रामलाल दोनों जाट है। परसादी मीणा के खिलाफ कार्यवाही करना भी उत्पन्न हालात में नजर नहीं आ रहा है। बाबूलाल नागर को छेडना भी मुष्किल होगा। अंत में बचे भरोसी जाटव। भरोसी जाटव सबसे अन्तिम में पकड में आये है।
एक ओर जब पहले के खिलाफ कार्यवाही करना मुष्किल हो जायेगा तो फिर लग रहा है कि संतुलन बनाये रखने के लिए किसी को भी छेडना संभव नहीं हो पायेगा। सभी के साथ जाति की राजनीति और प्रभाव जुडा हुआ है। ऐसे में किसी एक पर कार्यवाही और दूसरे को अभयदान देना राजनीति में साफ संकेत देगा। चुनाव की उल्टी गिनती में भले ही अभी समय हो पर आसार तो अभी से नजर आने लग गये है। ऐसे में जाटों की दबगई के आगे झुकते गहलोत के लिए आगे की पारी की उम्मीद तो ना उम्मीदी है तो फिर इस पारी को खेलने में कजूंसी कौन करना चाहेगा। इस सब के बीच एक बात जो अमीन खॉ के इस्तीफे से शुरू हुई थी गोपालगढ की 10 मौतों पर आकर फिलहाल ठहर गई है। वो साफ है प्रदेश में अल्पसंख्यकों का भरोसा कांग्रेस से पूरी तरह उठ चुका है। हालात को देखकर लग रहा है कि इसकी चिंता कांग्रेस और सरकार किसी को नहीं है।

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