भारत-पाकिस्तान सीमा से कुछ ही दूर स्थित गांव कोठा। सुबह के छह बजे होंगे। सूर्याेदय की लालिमा में एक मस्जिद नजर आ रही है। जरा नजदीक गए तो ‘वाहेगुरु-वाहेगुरु’ का जाप सुनाई दिया। एक मस्जिद से अजान की बजाय गुरबाणी सुनकर कदम और आगे बढ़े। मस्जिद की इमारत में श्रीगुरु ग्रंथ साहिब का दरबार सजा था। कोठा गांव का यह धार्मिक स्थल बरसों से सांप्रदायिक सौहाद्र्र का प्रतीक बना है।

खास बात यह है कि मुस्लिमों ने इस मस्जिद का निर्माण करवाया और एक सिख कारीगर ने इसकी दीवारों पर नक्काशी की। यही नहीं, एक हिंदू कम्युनिटी ने मिलकर इस इमारत में गुरुद्वारा स्थापित किया। भारत-पाक विभाजन के समय की इस अद्भुत मिसाल को देखकर हिंदू, मुस्लिम, सिख और ईसाई सभी का सिर श्रद्धा से झुक जाता है।
किसी को एतराज नहीं
गांव के पूर्व सरपंच सुरेशकुमार बताते हैं कि सरहदी इलाका होने के कारण सुरक्षा बल कई बार सवाल करते हैं कि इस स्थान से किसी को एतराज तो नहीं? हम जानते हैं कि ऊपर वाले के इस घर से किसी को एतराज नहीं। मुसलमान चाहते थे कि मस्जिद के लिए बनी इमारत का सम्मान हो तो उनकी बात पूरी हुई। यहां की छत का लेंटर खोलते वक्त इस भवन को तैयार करने वाले कारीगर सुच्चासिंह को मुक्तसर (पंजाब) से बुलाया गया। इमरजेंसी के दौरान भी कई बार सरकारी नुमाइंदों ने अनहोनी की आशंका में यहां चक्कर लगाए। यहां सब कुशल-मंगल है। मुस्लिम खुश हैं कि खुदा को याद करने के लिए बनाई जगह पर रब का वास हो गया है।
लगता है माघी मेला
यहां हर साल माघ के महीने में मेला लगता है। श्रीअखंड साहब के पाठ होते हैं। पूरे भवन को सजाया जाता है और गांव वालों के सहयोग से अटूट लंगर लगता है। माघ मेले की रौनक देखने लायक होती है। दूर-दूर से लोग मेला देखने आते हैं। गांव की श्रीअरोड़वंश ट्रस्ट के अध्यक्ष शगनलाल मक्कड़ पुराने दिनों को याद करते हैं। गुरुद्वारे का नाम अरोड़वंश गुरुद्वारा रखा गया। कुछ समय पहले यहां दीवारों में दरारें आईं तो पूरे गांव ने मिलकर इस पवित्र इमारत को संवारा। सुबह-शाम इस गुरुद्वारे में ‘नितनेम’ होता है। हैड ग्रंथी इकबालसिंह के अनुसार, संगतों का विश्वास है कि यहां माथा टेकने से मन्नतें पूरी होती हैं।
सरहदें बंटी, प्यार नहीं
आजादी से पहले कोठा गांव में मुस्लिम आबादी ज्यादा थी। यहां खूबसूरत मस्जिद का निर्माण अंतिम चरण में था। छत का लेंटर पड़ चुका था। इस बीच, भारत-पाक विभाजन हुआ और मुसलमान पाकिस्तान चले गए। सरहद की ये लकीर दिलों को नहीं बांट पाई। मुसलमान जाते हुए अपने हिंदू भाइयों से कह गए कि जैसे भी हो, मस्जिद की इस पवित्र जगह का सम्मान हो। हिंदू कम्यूनिटी अरोड़वंश ट्रस्ट ने छत का लेंटर खुलवाया और एक ऐतिहासिक निर्णय लिया गया। मुस्लिमों की ओर से बनाई इस खूबसूरत इमारत में हिंदुओं ने मंदिर न बनाकर श्री गुरुग्रंथ साहिब की स्थापना की।
गीदड़ांवाली का मस्जिद वाला गुरुद्वारा
गीदड़ांवाली की यह जगह मस्जिद वाला गुरुद्वारा नाम से जानी जाती है। यहां एक बूढ़ा पीपल है, जो विभाजन का साक्षी है और चश्मदीद गवाह है हिंदू-मुस्लिम प्रेम का। इस गुरुद्वारे के ग्रंथी कुलदीपसिंह के अनुसार, 1953 में उनके पिता बलवंतसिंह ने यहां पाठी की गद्दी संभाली थी। बकौल कुलदीपसिंह, पिताजी बताते थे कि 1947 के बाद ही यहां श्री गुरुग्रंथ साहिब का प्रकाश हुआ था। करीब दस साल पहले तक इस जगह पर सजदा करने मुस्लिम भी आते थे।
मुस्लिम भी आते हैं धरोहर देखने
दीवानखेड़ा की यह मस्जिद भी गुरु का घर है। गांव की श्रीगुरुद्वारा वेलफेयर सोसायटी इसकी देखभाल कर रही है। भाई रामलुभाया ने बताया कि विभाजन के बाद हिंदू मालाराम ने यहां श्री गुरुग्रंथ साहिब विराजमान करवाया था। 1947 में खंडहर हो चुकी इस मस्जिद का पुनरुद्धार गांव के लोगों ने करवाया। अभी कुछ समय पहले ही यहां रंग-रोगन करवाकर इसे नया रूप भले ही दे दिया हो लेकिन इसके मूल स्वरूप से छेड़छाड़ नहीं की गई। आज भी कई मुस्लिम परिवार अपनी इस धरोहर को देखने आते हैं।
खास बात यह है कि मुस्लिमों ने इस मस्जिद का निर्माण करवाया और एक सिख कारीगर ने इसकी दीवारों पर नक्काशी की। यही नहीं, एक हिंदू कम्युनिटी ने मिलकर इस इमारत में गुरुद्वारा स्थापित किया। भारत-पाक विभाजन के समय की इस अद्भुत मिसाल को देखकर हिंदू, मुस्लिम, सिख और ईसाई सभी का सिर श्रद्धा से झुक जाता है।
किसी को एतराज नहीं
गांव के पूर्व सरपंच सुरेशकुमार बताते हैं कि सरहदी इलाका होने के कारण सुरक्षा बल कई बार सवाल करते हैं कि इस स्थान से किसी को एतराज तो नहीं? हम जानते हैं कि ऊपर वाले के इस घर से किसी को एतराज नहीं। मुसलमान चाहते थे कि मस्जिद के लिए बनी इमारत का सम्मान हो तो उनकी बात पूरी हुई। यहां की छत का लेंटर खोलते वक्त इस भवन को तैयार करने वाले कारीगर सुच्चासिंह को मुक्तसर (पंजाब) से बुलाया गया। इमरजेंसी के दौरान भी कई बार सरकारी नुमाइंदों ने अनहोनी की आशंका में यहां चक्कर लगाए। यहां सब कुशल-मंगल है। मुस्लिम खुश हैं कि खुदा को याद करने के लिए बनाई जगह पर रब का वास हो गया है।
लगता है माघी मेला
यहां हर साल माघ के महीने में मेला लगता है। श्रीअखंड साहब के पाठ होते हैं। पूरे भवन को सजाया जाता है और गांव वालों के सहयोग से अटूट लंगर लगता है। माघ मेले की रौनक देखने लायक होती है। दूर-दूर से लोग मेला देखने आते हैं। गांव की श्रीअरोड़वंश ट्रस्ट के अध्यक्ष शगनलाल मक्कड़ पुराने दिनों को याद करते हैं। गुरुद्वारे का नाम अरोड़वंश गुरुद्वारा रखा गया। कुछ समय पहले यहां दीवारों में दरारें आईं तो पूरे गांव ने मिलकर इस पवित्र इमारत को संवारा। सुबह-शाम इस गुरुद्वारे में ‘नितनेम’ होता है। हैड ग्रंथी इकबालसिंह के अनुसार, संगतों का विश्वास है कि यहां माथा टेकने से मन्नतें पूरी होती हैं।
सरहदें बंटी, प्यार नहीं
आजादी से पहले कोठा गांव में मुस्लिम आबादी ज्यादा थी। यहां खूबसूरत मस्जिद का निर्माण अंतिम चरण में था। छत का लेंटर पड़ चुका था। इस बीच, भारत-पाक विभाजन हुआ और मुसलमान पाकिस्तान चले गए। सरहद की ये लकीर दिलों को नहीं बांट पाई। मुसलमान जाते हुए अपने हिंदू भाइयों से कह गए कि जैसे भी हो, मस्जिद की इस पवित्र जगह का सम्मान हो। हिंदू कम्यूनिटी अरोड़वंश ट्रस्ट ने छत का लेंटर खुलवाया और एक ऐतिहासिक निर्णय लिया गया। मुस्लिमों की ओर से बनाई इस खूबसूरत इमारत में हिंदुओं ने मंदिर न बनाकर श्री गुरुग्रंथ साहिब की स्थापना की।
गीदड़ांवाली का मस्जिद वाला गुरुद्वारा
गीदड़ांवाली की यह जगह मस्जिद वाला गुरुद्वारा नाम से जानी जाती है। यहां एक बूढ़ा पीपल है, जो विभाजन का साक्षी है और चश्मदीद गवाह है हिंदू-मुस्लिम प्रेम का। इस गुरुद्वारे के ग्रंथी कुलदीपसिंह के अनुसार, 1953 में उनके पिता बलवंतसिंह ने यहां पाठी की गद्दी संभाली थी। बकौल कुलदीपसिंह, पिताजी बताते थे कि 1947 के बाद ही यहां श्री गुरुग्रंथ साहिब का प्रकाश हुआ था। करीब दस साल पहले तक इस जगह पर सजदा करने मुस्लिम भी आते थे।
मुस्लिम भी आते हैं धरोहर देखने
दीवानखेड़ा की यह मस्जिद भी गुरु का घर है। गांव की श्रीगुरुद्वारा वेलफेयर सोसायटी इसकी देखभाल कर रही है। भाई रामलुभाया ने बताया कि विभाजन के बाद हिंदू मालाराम ने यहां श्री गुरुग्रंथ साहिब विराजमान करवाया था। 1947 में खंडहर हो चुकी इस मस्जिद का पुनरुद्धार गांव के लोगों ने करवाया। अभी कुछ समय पहले ही यहां रंग-रोगन करवाकर इसे नया रूप भले ही दे दिया हो लेकिन इसके मूल स्वरूप से छेड़छाड़ नहीं की गई। आज भी कई मुस्लिम परिवार अपनी इस धरोहर को देखने आते हैं।
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