थार में लुप्त हो रहा सरगुड़ा

थार में लुप्त हो रहा सरगुड़ा 
 

 कभी राजस्थान में प्रमुखता से पाया जाने वाले औषधीय महत्व के सरगुड़ा के उपयोगी पेड़ अब लुप्त होने के कगार पर हैं। एक समय था जब अरावली पर्वतमाला से जुडे इलाकों से लेकर रेगिस्तानी इलाकों तक यह पेड़ काफी संख्या में पाया जाता था, लेकिन अब यह केवल संरक्षित क्षेत्रों तक ही सिमट कर रह गया है। इसकी विश्व भर में पाई जाने वाली इसकी 34 में से राजस्थान में दो प्रजातियां पाई जाती हैं। मोंरिगेसी कुल के इस वृक्ष का वानस्पतिक नाम मोरिंगा कोन्कानेन्सिस है। इसकी विश्व भर में पाई जाने वाली 34 प्रजातियों में से राजस्थान में दो ही पाई जाती हैं। 

सरगुड़ा को संरक्षित करेने के प्रयास कर रहे वैज्ञनिकों को बाड़मेर में चौहटन तहसील के विरात्रा माता का मंदिर के चारों और संरक्षित क्षेत्र में सरगुड़ा के कुछ पेड़ मिले हैं। पहले देचू इलाके में इसके काफी पेड़ थे, लेकिन धीरे-धीरे वहां से भी लुप्त हो गए। इसी तरह शिवगंज में एक फॉर्म हाउस पर सरगुड़ा के पेड़ बचे हैं।

एक पेड़ भोपालगढ़ में है। इसके फूल में दल पर लाल धारी होती है। इसकी फली के बीज से लेकर फल, फूल, गोंद और छाल आदि ग्रामीणों एवं पशु-पक्षियों के काम आते हैं। इसके बीज से खाद्य तेल बनता है तो बीज भेड़-बकरियां खाती हैं। इसकी छाल का उपयोग सूजन, ह्वदय रोग आदि रोगों की औषधियां बनाने में किया जाता है। इसकी पत्तियों में विटमिन ए और सी होता है। 

विलुप्त होने के कारण
इसके बीजों को भेड़-बकरियां खा जाती हैं। इसलिए बीजों की कमी से नए पौधेे कम बनते हैं। उस पर बकरी, मोर, गिलहरी और पक्षी आदि शिशु पौधे को भी नुकसान पहुंचाते हैं। यह जुलाई-अगस्त में अंकुरित होता है। पहाड़ और पठारी भूमि पर होने के कारण इसकी जड़ें गहरी नहीं जा सकती। इसलिए पानी के अभाव में इसकी पत्तियां झड़ जाती हैं। यदि बरसात होने में देरी हो तो यह पौधा मर जाता है। पुराने पेड़ों की छाल औषधियां बनाने के काम आती है। कई बार छाल इतनी गहराई से उतारी जाती है कि पेड़ मर जाता है।

900 पौधे तैयार
चौहटन से सरगुड़ा के बीज एकत्र कर उनके अंकुरण की कई विधियां अपनाई गईं। अंकुरित हुए पौधों को संस्थान के बगीचे में लगाया गया। वर्तमान में इन पौधों की ऊंचाई दो-तीन मीटर हो गई है। गमलों में सरगुड़ा के करीब 900 पौधे तैयार हैं। अब बरसात आने पर इन्हें संरक्षित वन क्षेत्रों में लगाने की तैयारी की जा रही है। -डॉ. सुरेश कुमार, वरिष्ठ वैज्ञानिक, केंद्रीय शुष्क क्षेत्र अनुसंधान संस्थान (काजरी)

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