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बाड़मेर। धर्म आराधना से सुसंस्कारों में वृद्धि होती हैं -मुनि कमलप्रभसागर


बाड़मेर। स्थानीय जैनाचार्य श्री गुणसागरसूरि साधना भवन में प्रतिदिन चल रहे प्रवचन माला में मारवाड़ रत्न प्रबुद्ध प्रवचनकार परम पूज्य मुनिराज कमलप्रभसागर ने कहा कि परदेषी संस्कृति स्वार्थ प्रधान है जबकि भारतीय संस्कृति परमार्थ प्रधान हैं। आर्यदेष में एक दूसरे के प्रति आदर से सहायता करने का विषेष भाव रहता है।



प्रचार प्रसार मंत्री नरेन्द्र श्रीश्रीमाल ‘‘विनय‘‘ ने बताया मुनिराज कमलप्रभसागर ने आगे कहा कि अनार्य देष में सभ्यता संस्कृति का निरंतर पतन हो रहा है। माता-पिता के चरणस्पर्ष तो दूर उनके बुढापे में उन्हें वृद्धाश्राम भेज दिया जाता है। मान-मर्यादा का कोई भान नहीं आधुनिकता की चकाचैंध में मानवता गर्त में प्रवेष कर रही है। सामाजिक संबंधों की काया पलट हो गई हैं। रिष्ते नाते कोई मायना नहीं रखते। परेदषी संस्कृति के छींटे हमारे आर्य देष में नहीं आवे इसके लिए हमे निरंतर जागरूक होने की जरूरत है। हमारी संस्कृति हमारी शान है।

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प्रवक्ता प्रवीण मालू ने बताया कि मुनिराज ने आगे कहा कि आधुनिकता के नाम पर आज हमारे संस्कार हमारी संस्कृति बिखरे नहीं इसके लिए हमें अपने बच्चों को धार्मिक गुरू के पास संस्कारित करने के लिए नित्य भेजना चाहिए। आज रहन-सहन में हो रहे बदलाव कल हमारे लिए घातक नहीं हो ,हमारी बहु-बेटियां सुसंस्कारित बने इसके लिए हमारे को धार्मिक षिविरों का आयोजन भी करना चाहिए। आज स्वार्थ हावी हो रहा है जिसके कारण रिष्तों का कोई मोल नहीं, ऐसी घड़ी में हमारे सामाजिक संबंध हमारे नैतिक कर्तव्य हमें नहीं भूलने चाहिए। हमारी परंपराएं हमारी धरोहर है ,हमें इसे सदैव जीवित रखना है।

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