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सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) के पांच दशक से ज्यादा के इतिहास में ‘कॉम्बेट ऑफिसर’ बनने वाली पहली महिला  ।



कुछ उपलब्धियां ऐसी होती हैं, जो हासिल करने वाले के अपने जीवन में ‘मील का पत्थर’ तो होती ही हैं, दूसरे लाखों लोगों के लिए प्रेरणा का सबब भी बनती हैं। 25 वर्षीया तनुश्री पारीक की उपलब्धि भी कुछ ऐसी ही है। वह सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) के पांच दशक से ज्यादा के इतिहास में ‘कॉम्बेट ऑफिसर’ बनने वाली पहली महिला हैं। ‘कॉम्बेट ऑफिसर’ यानी वह भारतीय सीमा की रक्षा में प्रत्यक्ष योगदान देंगी और जरूरत पड़ी तो आमने-सामने दुश्मनों से दो-दो हाथ भी करेंगी।
परंपरागत रूप से सेना और अद्र्धसैनिक बलों में महिलाओं को फील्ड में ड्यूटी पर नहीं रखा जाता, लेकिन पिछले कुछ सालों से नियमों में बदलाव कर महिलाओं को फील्ड में तैनात किया जाने लगा है। अभी कुछ माह पहले ही 2016 में भारतीय वायुसेना ने तीन महिलाओं को पहली बार जेट फाइटर पायलट के रूप में चुना था। राजस्थान के बीकानेर की तनुश्री पारीक ने भी इस सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए इतिहास रचा है। वर्तमान में ढाई लाख से ज्यादा क्षमता वाले सीमा सुरक्षा बल की स्थापना 1965 में हुई थी, लेकिन यहां महिलाओं को ‘ऑपरेशन ड्यूटी’ के लिए आवेदन करने की अनुमति 2013 में दी गई है। चार चरणों की कठिन भर्ती प्रक्रिया का सामना करने के बाद तनुश्री 2014 में बीएसएफ की पहली ‘महिला असिस्टेंट कमांडेंट’ के रूप में चुनी गईं। अपने साथ प्रशिक्षण प्राप्त करने वाले 67 प्रशिक्षु अधिकारियों की पासिंग आउट परेड का नेतृत्व भी 25 वर्षीया तनुश्री ने ही किया था।


उपलब्धि का रोमांच
अपनी इस उपलब्धि से उत्साहित तनुश्री का कहना था, ‘मैं इतनी रोमांचित थी कि परेड के लिए मैंने खुद को दुगने उत्साह के साथ तैयार किया। मुझे लगता है कि लड़कियों को कठिन कार्यों में सक्रिय रूप से हिस्सा लेने का समय आ गया है।’ उनकी पहली तैनाती पंजाब में भारत-पाकिस्तान सीमा पर होने वाली है। तनुश्री ने आज इस मुकाम तक पहुंचने के लिए बहुत कड़ी मेहनत की है। 13 माह की बेहद कड़ी ट्रेनिंग के दौरान उन्होंने युद्ध कौशल, खुफिया सूचनाएं जुटाने और सीमा की सुरक्षा से जुड़े दूसरे कार्यों का प्रशिक्षण हासिल किया। अपनी टे्रनिंग के दौरान अपनी असाधारण उपलब्धियों के लिए उन्होंने ‘ड्रिल’, ‘ऑलराउंड बेस्ट ट्रेनी’ और ‘पब्लिक स्पीकिंग’ के तीन पुरस्कार भी हासिल किए।
बीएसएफ के इतिहास में पहली महिला कॉम्बेट ऑफिसर बन कर इतिहास रचने वाली तनुश्री करीब तीन माह पहले अपने गृहनगर बीकानेर पहुंची तो उनका भव्य स्वागत हुआ, जो स्वाभाविक ही है। तनुश्री शुरू से ही मेधावी थीं। उन्होंने बीकानेर के गवर्नमेंट इंजीनियर कॉलेज से इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल की है। उसके बाद उन्होंने ‘इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय’ (इग्नू) से ‘रूरल डेवलपमेंट’ में स्नातकोत्तर की पढ़ाई की। उन्होंने सिविल सर्विसेज की तैयारी भी की और प्रारंभिक परीक्षा में सफलता हासिल की, हालांकि मेन्स में सफल नहीं हो सकीं।


ऐसे शुरू हुआ वर्दी से प्यार
बीएसएफ या दूसरे सैन्य बलों में जाने की बात मन में पहली बार कब आई? इस सवाल पर तनुश्री का कहना था कि शुरू में वह उन आम बच्चों की तरह ही थीं, जो हर चीज में हिस्सा लेते हैं। वह कहती हैं, ‘बीएसएफ या सैन्य बल में जाना है, इसकी कोई योजना पहले से मेरे मन में नहीं थी। जब मैं कॉलेज में थी, मैंने एनसीसी ज्वाइन किया था। उस समय मैंने प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी शुरू की, तो मन में वर्दी के प्रति आकर्षण पैदा हुआ।’


कोई भी लक्ष्य पाना नहीं है मुश्किल
तनुश्री का मानना है कि अगर जिंदगी में कोई लक्ष्य निर्धारित कर लें और उसे हासिल करने के लिए पूरी तरह जुट जाएं तो असंभव कुछ नहीं हैं। उनका कहना है, ‘मेरा मानना है कि किसी पर निर्भर मत होइए। अपनी जिंदगी में अपना मुकाम हासिल करके आदमी को जो खुशी होती है, उससे एक अलग प्रकार का आत्मविश्वास आता है।’ उनका मानना है कि सैन्य बलों में जाने से जीवन में अनुशासन आता है। इसमें कोई संदेह नहीं कि आज तनुश्री भारत की बहुत सारी युवतियों के लिए रोल मॉडल बन चुकी हैं। बीएसएफ में तनुश्री पारीक जैसी महिलाओं के जाने से सीमा की सुरक्षा में दिन-रात तैनात इस सैन्य बल की क्षमताओं में निश्चित रूप से इजाफा होगा।

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