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बाड़मेर। राज रूठा सो रूठा, कुदरत का गुस्सा भी असहायों पर टूटा 


@ सुशीला दहिया की कलम से..

बाड़मेर। कहते हैं किस्मत और जेब जब साथ न दे तब कड़ा संघर्ष ही एकमात्र माध्यम रह जाता हैं हक पाने का। वेसे तो आम इंसान के बूते की बात नही रहती न्याय पाना, क्योंकि पैसो की कसौटी पर विराजमान लोकतंत्र किसी का दर्द-मजबूरी न तो देखता हैं न ही महसूस करता हैं। और फिर क्यों महसूस करे..? एयरकंडीशनर वातावरण में सुख भोगने वाला लोकतंत्र, तिरंगे के सामने सड़क किनारे छोटे से तम्बू में वजूद की जंग लड़ रहे मजबूर इंसानों के दुख दर्द से इनका क्या वास्ता...। यही कारण हैं कि राज की नजरों में तिरस्कृत एक असहाय परिवार पर बीती रात कुदरत ने भी अपना कहर बरपा दिया। हवाओं को तुफान का चोला पहना कर कुदरत ने संघर्ष कर रहे इस परिवार का तम्बू ही उखाड़ दिया। यही नहीं आसमान से बेइंतहा बरसे पानी ने इस संघर्षरत परिवार को बुरी तरह से भीगो दिया,,, न तो पहनने के कपड़े सूखे रहे न ही ओढऩे बिछाने के बिस्तर,,,, सब कुछ भीगकर तहस नहस सा हो गया...। 


तम्बू... अरमान... अहसास... उम्मीद... जीन्दगीयां... सब कुछ राहगुजर की जनरों में एक तमाशा बन कर रह गया। बात और माजरा, दौनो बाड़मेर जिला मुख्यालय पर शान से लहरा रहे तिरंगे के सामने एक दलित परिवार के मुखिया की हत्या के आरापियों की गिरफतारी की मांग को लेकर दिए जा रहे अनिश्चतकालीन धरने का हैं। परिवार का कमाऊ मुखिया खोने के बाद, कौन जाने कितनी राते सड़क पर बीत गई, इस उम्मीद के साथ कि आज जरूर न्याय मिलेगा...। 


लेकिन उम्मीद पर व्यवस्था और कुदरत दौनो भारी पड़ गए...। सरकार को दर्द से सुबकते परिवार के आंसु नजर नहीं आते,,, लेकिन इंसानी फितरत जग जाहीर हैं... जब तक न्याय नही मिलेगा संघर्ष यूं ही बदस्तूर जारी रहेगा। बीती रात बाड़मेर में तुफानी बरसात से आहत हूए इस असहाय परिवार की सरकार को सूध लेनी चाहिए,,, न्याय की उम्मीद को अमली जामा पहनाना चाहिए,,, क्यों कोई घर आंगन छोड़ कर प्रशासन के सामने सड़कों पर राते बिताने को मजबूर हो जाए... प्रशासन को इस परिवार पर दया आनी चाहिए,,, प्रशासन की आंखे भीगनी चाहिए,,, हजार आंसु दुख के यह परिवार रोया हैं,,, सहानुभूति के दो आंसु प्रशासन को भी बहाने चाहिए....।

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