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बाड़मेर पश्चिमी सरहद पर रिश्तों में बढ़ती दरारे।।मानवीयता खत्म होने को।।



बाड़मेर आधुनिकता की दौड़ और रुपयों की चमक दमक ने कभी संस्कृति और परंपराओं के सरंक्षक माने जाने वाले पश्चिमी राजस्थान के थार क्षेत्र में आपसी रिश्ते तार तार हो रहे हैं ।रिश्तों में बढ़ती दरारे मानवीयता का गला घोंट रही हैं

ऐसा नह की इस क्षेत्र में अपराध नया हो।लेकिन घृणित अपराध नया हैं।।साधारणतः विवाहिताओं द्वारा अपनी औलाद को साथ ले कर आत्महत्या करने का ट्रेंड चल पड़ा तो पिछले दिनों से प्रतिदिन हत्याओं के दौर ने आम आदमी को हिला के रख दिया।हत्याओं के कोई ठोस कारण भी नही।बरियादा का तिहरा हत्याकांड,मोकलसर में संत की हत्या,चोयहतं में एक ही दिन में बेटों द्वारा पिता को मौत के घाट उतारने की दो घटनाए।।कारण मामूली कहासुनी, आपसी मतभेद,जमीन ,।।क्या इंसानियत राह गई।जिस बाप ने पूरी उम्र रक्षक बन पाल पोश कर बड़ा करते हैं।बेटे पल भर में बाप को ऐसे मार देते है ।ऐसे किसी जानवर को भी नही मरते।विवाहिताएं बच्चो को लेकर टांकों में कूद अपनी और बच्चो की इहलीला समाप्त करती हैं।।सहन शीलता के अभाव में ऐसी घटनाएं आम हो गई।।पारिवारिक कहासुनी,मामूली बोलचाल ,पे इतना संख्त कदम उठा लेती ही महिलाए।कहने को महिलाए ममता का दूसरा रूप होती हैं।जब ऐसी घटनाओं की तरफ ध्यान जाता है तो मन विचलित होजाता हैं। बाड़मेर जैसे शांत और धैर्य इलाके को किसकी नजर लगी।।हत्याओं के ऐसा दौर पहले कभी नही आया।।पुलिस विभाग पर दोषारोपण करने का कोई औचित्य नही।पारिवारिक संस्कार खत्म हमने ही किये।।आज हम अपनी संस्कृति और परंपराओं को भूल बैठे।पारिवारिक रिश्तो में दूरियां बढ़ गई।भाई भाई का दुश्मन।और तो और जन्म देने वाली मां तक कि हत्याओं की घटनाएं सामने आ रही।संभवतः मानवता इंसान के अंदर से मर चुकी हैं।।




सरकारी तंत्र ऐसी घटनाओं को रोक नही सकते।मगर ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति को अवश्य रोक सकते हैं।।डिप्रेशन, धैर्य,सहन शक्ति,जैसे मुद्दों पे आमजन को समझाईस की जा सकती हैं।पीड़ित महिलाओं को विश्वास दिल सकते है कि परेशानी है तो कानून और उसके रक्षक मदद करने के लिए हैं।।




बाड़मेर जैसी घटनाएं खासकर सामूहिक आत्महत्याओं की अन्यत्र न के बराबर हैं।।जिला प्रशासन और पुलिस प्रशासन को स्वयं सेवी संगठनों के सहयोग से ब्लॉक और ग्राम पंचायत स्तर पर ऐसे सेमिनार ,और गोष्ठियां करा आमजन में समझाईस की पहल करनी होगी।अपराध कारित होने से कुछ हद तक कम किया जा सकता हैं।।अपराध कही भी हो सकता हैं।मगर इस तरह रिश्तो की हत्या थार में ही हो रही ।।जनजागरण की जरूरत है देखे कौन फल करता हैं। आपसी रिश्तों और उसके अहसासों को जिंदा तभी रख पाएंगे जब हम अपनी संस्कृति और परंपराओं को पुनः अपनाएंगे।।।

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