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तीखी बात पांच किसानों की मौत का जिम्मेदार कौन है!

सत्ताधारी दल की लॉलीपॉप छाप राजनीति ? या राजनीतिक दलों की गलाकाट प्रतियोगिता ? या असामाजिक तत्वों के बढ़ते हौंसले ? कौन है जिम्मेदार किसानों की मौत का ?

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

मंदसौर में पांच किसान बंदूक की गोली से मारे गए। इस बात पर अनंत काल तक बहस की जा सकती है कि इन किसानों की हत्या का जिम्मेदार कौन है! कांग्रेस, कम्यूनिस्ट और समाजवादी तबका जिसमें राजनेता से लेकर उनके पिछलग्गू मीडिया घराने तक सब शामिल हैं, एक स्वर से चिल्लाएंगे कि इसके लिए मध्य प्रदेश की बीजेपी सरकार जिम्मेदार है। मध्य प्रदेश की बीजेपी सरकार के मुख्यमंत्री इस गोलीकाण्ड के कुछ ही देर बाद वक्तव्य दे चुके हैं कि पुलिस ने गोली नहीं चलाई। मंदसौर के कलक्टर कह चुके हैं कि मैंने गोली चलाने के आदेश नहीं दिए। पुलिस अधिकारी कह चुके हैं कि पुलिस ने गोली नहीं चलाई। किसानों ने पहले तो कहा कि गोली पुलिस ने चलाई और अब कह रहे हैं कि गोली सीआरपीएफ ने चलाई। सीआरपीएफ भी मना कर चुकी। टीवी पर चल रहे वीडियो बता रहे हैं कि आंदोलनकारी किसानों को समझाने गए मंदसौर के जिला कलक्टर स्वतंत्र कुमार से किसानों ने मारपीट की। राज्य सरकार ने गोली चलने के कुछ घण्टे के भीतर ही इस गोलीकाण्ड की न्यायिक जांच के आदेश दे दिए जिससे अनुमान होता है कि राज्य सरकार इस आकस्मिक गोलीकाण्ड से घबराई हुई है और इस मामले में लीपापोती नहीं कर रही।

भारतीय लोकतंत्र में इस तरह की घटनाएं दुखद और शर्मनाक तो हैं किंतु भारतीय लोकतंत्र की कमजोरी को भी स्पष्ट करती हैं। भारतीय लोकतंत्र में लचीलापन जरूरत से ज्यादा है इसलिए सरकारें सामान्यतः तब तक गोली नहीं चलातीं जब तक कि स्थितियां बिल्कुल ही हाथ से नहीं निकल जाएं। मध्य प्रदेश के किसान आंदोलन की आग महाराष्ट्र के किसान आंदोलन के बाद भड़की। महाराष्ट्र के किसान अपनी फसलों, अपने दूध तथा अपनी सब्जियों को सड़क पर फैंक रहे थे (हालांकि ऐसा करके वे कोई लोकतांत्रिक आदर्श स्थापित नहीं कर रहे थे), जबकि मध्य प्रदेश के किसानों ने बाजारों में सजी दुकानों का सामान लूटना और फैंकना शुरू कर दिया था। पर्याप्त संभव है कि यह काम भी किसानों की आड़ में असामाजिक तत्वों ने किया और भड़के हुए किसानों पर गोली चलाने का काम भी उन्हीं असाजिक तत्वों ने किया।

नवम्बर 2018 में मध्यप्रदेश में विधान सभा चुनाव होने वाले हैं। यह संदेह उत्पन्न होना स्वाभाविक है कि क्या कुछ असमाजिक तत्व मध्य प्रदेश में कानून व्यवस्था बिगाड़कर शिवराजसिंह सरकार को बदनाम करने की कोशिश कर रहे हैं! मृत किसानों के शरीर में वे गोलियां निश्चित रूप से मिल जाएंगी जिन्होंने इन किसानों के प्राण लिए हैं। इन गोलियों के सहारे उन बंदूकों को ढूंढा जा सकता है जिनसे ये चली हैं तथा उन अपराधियों को भी पकड़ा जा सकता है जिनके कंधों पर ये बंदूकें रखी हुई थीं।

दिल्ली में आप पार्टी के उत्थान के बाद से, भारतीय राजनीति में रातों रात सफल होने के फार्मूले तलाशे जाने लगे हैं। उत्तर प्रदेश के विधान सभा चुनावों में जिस प्रकार किसानों को ऋण माफी का लालच देकर उनसे वोट लिए गए, बहुत स्वाभाविक था कि इससे दूसरे प्रदेशों के किसानों में भी बेचैनी उत्पन्न होती। असामाजिक तत्वों ने इसी बेचैनी का लाभ उठाया लगता है। भारतीय लोकतंत्र के लिए राजनीतिक सफलताओं हेतु अपनाए जाने वाले शॉर्टकट्स और भी अधिक खतरनाक और शर्मनाक हैं। इन्हें वे राजनीतिक दल अपनाते हैं जो जनता के दुख-दर्द दूर करने के लिए जनता के हितैषी बनकर घड़ियाली आंसू ढारते हैं तथा वोट हथिया लेते हैं। यदि ऐसा है तो भारत की जनता को अधिक समझदारी से काम लेना होगा।

किसानों, उद्योगपतियों, व्यवसाइयों और अन्य लोग, चाहे वे कोई भी क्यों न हों, कब तक सरकारें उनके ऋण माफ कर सकती हैं! हमारी शक्ति इस बात पर व्यय नहीं होनी चाहिए कि किनके ऋण माफ किए जाएं और किनके नहीं, अपितु इस बात पर लगनी चाहिए कि कृषि को अधिक लाभकारी कैसे बनाया जाए! किसानों को सस्ता पानी, सस्ती बिजली और सस्ता खाद कैसे मिले! उनकी फसल का सही मूल्य कैसे मिले! देश में अन्य वस्तुए महंगी न हों तो किसानों को भी अधिक मूल्य पर फसलें बेचने की आवश्यकता नहीं होगी। क्या केन्द्र की सरकार और राज्य सरकारें इस दिशा में ईमानदारी से कार्य कर रही हैं! या वे लोक-लुभावन बातों के जरिए जनता को मूर्ख बनाकर वोट बटोरने में ही अपने आप को अधिक लोक हितकारी बता रही हैं!

धरती गर्म हो रही है, पानी खतम हो रहा है, खेती सिमट रही है, काम-धंधे मंद पड़ रहे हैं। देश महंगाई से त्रस्त है किंतु किसानों को उनकी फसलों का पूरा मूल्य नहीं मिल रहा। ललित मोदी और विजय माल्या जैसे बड़े लुटेरे, नेताओं, मंत्रियों और अफसरों की सहायता से देश का पैसा लूटकर बाहर भाग जाते हैं। सुब्रत जैसे लोग बेशर्म होकर जेलों में पड़े रहते हैं और चारा घोटाले के आरोपी, पूरी जिंदगी बेल पर काट देते हैं। आम आदमी के मन से सरकारी व्यवस्था के साथ-साथ धर्म और आस्था भी रीत रही है। बलात्कार और अपराध बढ़ रहे हैं। राजनेताओं में सत्ता छीनने की गलाकाट प्रतियोगिता चल रही है। इन विषैली परिस्थितियों में रहने वाली जनता को सरकारें अंततः कितने दिनों तक शांत रख पाएंगी! ये स्थितियां तो दिनों दिन बढ़ती हुई ही प्रतीत होंगी। मंदसौर के पांच किसानों की मौत का जिम्मेदार तय करते समय हमें देश की इन परिस्थितियों के लिए जिम्मेदार लोगों को भी चिह्नित करना होगा।




-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

63, सरदार क्लब योजना

वायुसेना क्षेत्र, जोधपुर

मोबाइल: 9414076061

https://www.rajasthanhistory.com/

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