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बाड़मेर पृथ्वी दिवस पर आयोजन ग्रुप फॉर पीपल का 

अब भी नहीं जागे तो अपने बिगड़े भविष्‍य के लिए हम खुद होंगे जिम्‍मेदार 

  बाड़मेर सामाजिक सरोकार और नवाचार के प्रतिक ग्रुप फॉर पीपल बाड़मेर द्वारा विश्व पृथ्वी दिवस पर सुचना केंद्र में विचार गोष्ठी का आयोजन किया गया ,जिसमे ग्रुप संयोजक चंदन सिंह भाटी ,महेश पनपालिया ,संजय शर्मा ,दुर्जन सिंह गुडीसर ,नरेंद्र खत्री ,मदन बारूपाल ,छगन सिंह चौहान ,हिन्दू सिंह तामलोर ,रमेश सिंह इन्दा ,महेंद्र सिंह भाटी तेजमालता ,राजेंद्र लहुआ ,हितेश मूंदड़ा ,सहित कई सदस्यों ने शिरकत की ,पृथ्‍वी दिवस के अवसर संजय शर्मा ने कहा की पूरी दुनिया में पिछले 47 वर्षों से धरती के पर्यावरण को बचाने के लिए पृथ्वी दिवस मनाया जा रहा है लेकिन प्रदूषण घटने की बजाए बढ़ता ही जा रहा है और जलवायु परिवर्तन के खतरे से यह संकट और गहरा होता जा रहा है। आलम यह है कि अब खुद को बचाने की जंग का नाम ही पृथ्‍वी दिवस हो गया है। अगर अब भी हम नहीं चेते तो आने वाला समय सभी के लिए बर्बादी का समय होगा जिसके कर्ता-धर्ता भी हम ही होंगे।


चंदन सिंह भाटी ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा की दरअसल, 1969 में सांता बार्बरा, कैलिफोर्निया में बड़े पैमाने पर तेल फैल गया था जिससे काफी क्षति हुई थी। आपदा से व्यथित नेल्सन के दिमाग में कौंधा कि क्यों न लोगों को पर्यावरण के प्रति जागरूक करने की गरज से राष्ट्रीय स्तर पर ‘टीच-इन’ कार्यक्रम का आयोजन किया जाए। अमेरिका के सीनेटर गेलोर्ड नेल्सन के प्रयासों से 1970 में पहली बार पूरी दुनिया में पृथ्वी दिवस मनाया गया और तब से लेकर आज तक यह लगातार जारी है। पर्यावरण की रक्षा के लिए भारत समेत कई देशों में कानून भी बनाये गए लेकिन प्रदूषण पर काबू नहीं पाया जा सका जिससे पर्यावरण का संतुलन बिगड़ गया है।
परिस्थतिक तंत्र में आये बदलाव पर विचार व्यक्त करते हुए महेश पनपालिया ने कहा की आज विश्व का औसत तामपान भी 1.5 डिग्री बढ़ गया है। देश की राजधानी दिल्ली में अप्रैल में तापमान 40 डिग्री सेल्सियस से अधिक बढ़ गया है। उन्होंने बताया कि औद्योगिक उत्पादन के बढऩे और अंधाधुंध विकास कार्यों और पेट्रोल, डीजल तथा गैसों के अधिक इस्तेमाल से भारत कॉर्बन उत्सर्जन के मामले में विश्व में चौथे स्थान पर पहुंच गया है और हिमालय के ग्लेशियर भी पिघलने लगे हैं इससे भयंकर बाढ़ और प्राकृतिक आपदा की घटनाएं भी बढऩे लगी हैं।इस अवसर पर मदन बारूपाल ने कहा की भारत में नयी आर्थिक नीति के बाद पिछले 25 साल में आर्थिक गतिविधियों में काफी तेजी आयी और औद्योगिक विकास भी हुआ जिसका असर पर्यावरण पर भी हुआ। उन्होंने कहा कि भारत गत वर्ष दो अक्टूबर को जलवायु परिवर्तन पर हस्ताक्षर करने वाला 62वां देश बन गया इसलिए उसकी जिम्मेदारी बढ़ गयी है और जनता को भी अधिक संवेदनशील होने की जरूरत हैं। स्वच्छता आंदोलन तो एक हिस्सा है। पर्यावरण की रक्षा के लिए जन आंदोलन की जरुरत है। अन्यथा पृथ्वी दिवस मानाने का कोई औचित्य नहीं है।



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