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पाकिस्तान के किन्नरः कोर्ट ने बराबरी का दिया दर्जा लेकिन लोग करते हैं पशुआें से भी क्रूर व्यवहार










इस्लामाबाद। किन्नरों के हालात पाकिस्तान में ठीक नहीं हैं। रेप आैर मर्डर के एक नहीं कर्इ मामले यहां पर लगातार सामने आते रहते हैं। रोजाना इन्हें बदसलूकी का शिकार होना पड़ता है आैर भीख मांगकर अपनी जिंदगी गुजारनी पड़ती है। एेसे में लाहौर हार्इकोर्ट ने 2017 की जनगणना में इन्हें शामिल करने का एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाकर इनके जख्मों कों कुछ कम करने की कोशिश की है।







पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट ने किन्नरों को आम नागरिकों के बराबर अधिकार देने का एेलान 2012 में ही कर दिया था। इस तरह से किन्नरों को प्राॅपर्टी में हिस्सा आैर वोट देने का अधिकार मिल चुका है, लेकिन अभी तक समाज में बराबरी का दर्जा नहीं मिल सका है।



किन्नरों के समर्थन में कर्इ सामाजिक कार्यकर्ता आवाज उठा चुके हैं। उनका कहना है कि किन्नरों के साथ पशुआें से भी ज्यादा क्रूर व्यवहार किया जाता है। साथ ही पुलिसिया नजरिया भी किन्नरों के खिलाफ ही होता है।



किन्नरों को 2009 में सुप्रीम कोर्ट ने तीसरे जेंडर के तौर पर मान्यता तो दे दी लेकिन आज भी लोग किन्नरों के साथ असमानता का व्यवहार करते हैंं।





यहां तक की पाकिस्तान में किन्नरों के साथ हिंसा आैर सेक्सुअल हैरेसमेंट आम हैं। पेट भरने के लिए ये नाच-गाकर या फिर भीख मांगकर अपना गुजारा करते हैं। कर्इ बार इन्हें देहव्यापार के दलदल में भी धकेल दिया जाता है।



किन्नरों के शोषण के मामले पाकिस्तान के अलग-अलग इलाकों से सामने आते रहते हैं, लेकिन शोषण के सबसे ज्यादा मामले कबायली इलाकों में सामने आए हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार, अकेले खैबर पख्तूनख्वा में ही 45 किन्नर मारे गए हैं। वहीं किन्नर एक्टिविस्ट अलीशा को पेशावर में गोली मार दी गर्इ थी। उसे अस्पताल ले जाया गया, लेकिन अस्पताल ये ही तय नहीं कर सका कि उसे किस वार्ड में भर्ती करें। बाद में अलीशा की मौत हो गर्इ।

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