रविवार, 3 अगस्त 2014

ब्रह्मांड की आत्मा हैं : सूर्य देवता



जयपुर। वेदों में सूर्य को जगत की आत्मा कहा गया है। समस्त चराचर जगत की आत्मा सूर्य ही हैं। सूर्य से ही इस पृथ्वी पर जीवन है, यह आज एक सर्वमान्य शाश्वत सच्चाई है। वैदिक काल में आर्य सूर्य को ही सारे जगत का कर्ता-धर्ता मानते थे। सूर्य का शब्दार्थ है सर्व प्रेरक। यह सर्व प्रकाशक, सर्व प्रवर्तक होने से सर्व कल्याणकारी हैं। ऋग्वेद के अनुसार देवताओं में सूर्य का महत्वपूर्ण स्थान है। 

Soul of the Universe the sun god
यजुर्वेद ने चक्षो सूर्यो जायत कह कर सूर्य को भगवान का नेत्र माना है। छांदोग्यपनिषद में सूर्य को प्रणव निरूपित कर उनकी ध्यान साधना से पुत्र प्राप्ति का लाभ बताया गया है।ब्रह्मवैर्वत पुराण तो सूर्य को परमात्मा स्वरूप मानता है। प्रसिद्ध गायत्री मंत्र सूर्य परक ही है। सूर्योपनिषद में सूर्य को ही संपूर्ण जगत की उत्पत्ति का एकमात्र कारण निरूपित किया गया है और उन्हीं को संपूर्ण जगत की आत्मा तथा ब्रह्म बताया गया है। सूर्योपनिषद की श्रुति के अनुसार संपूर्ण जगत की सृष्टि तथा उसका पालन सूर्य ही करते हैं। सूर्य ही संपूर्ण जगत की अंतरात्मा हैं। 

अत: कोई आश्चर्य नहीं कि वैदिक काल से ही भारत में सूर्योपासना का प्रचलन रहा है। पहले यह सूर्योपासना मंत्रों से होती थी, बाद में मूर्ति पूजा का प्रचलन हुआ तो यत्र-तत्र सूर्य मंदिरों का निर्माण हुआ।भविष्य पुराण में ब्रह्मा-विष्णु के मध्य एक संवाद में सूर्य पूजा तथा मंदिर निर्माण का महत्व समझाया गया है। अनेक पुराणों में यह आख्यान भी मिलता है कि ऋषि दुर्वासा के शाप से कुष्ठ रोग ग्रस्त श्रीकृष्ण पुत्र सांब ने सूर्य की आराधना कर इस भयंकर रोग से मुक्ति पाई थी। प्राचीन काल में भगवान सूर्य के अनेक मंदिर भारत में बने हुए थे। उनमें से कुछ आज विश्व प्रसिद्ध हैं। कोणार्क का सूर्य मंदिर उनमें से एक है। वैदिक साहित्य में ही नहीं, बल्कि आयुर्वेद और ज्योतिष, हस्तरेखा शास्त्रों में भी सूर्य का महत्व प्रतिपादित किया गया है।





 

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