गुरुवार, 24 जुलाई 2014

बाडमेर 24 जुलाई। हृदय से हृदय की मुलाकात ही संवाद है-साध्वी सौम्यागुणाश्री


हृदय से हृदय की मुलाकात ही संवाद है-साध्वी सौम्यागुणाश्री 
बाड़मेर 24 जुलाई 2014 जिन कान्तिसागर सुरि आराधना भवन में अपनी मधुरिम वाणी में अध्यात्म रागिनी छेडते हुए साध्वी सौम्यागुणाश्री जी ने कहा की  मूल समस्याओं का समाधान अध्यात्म है। अध्यात्म के द्वारा ही चेतना का विकार समाप्त होकर उन्नति के शिखर को प्राप्त करना है। मन से वासनाओं का निकास ही निवार्ण है और मन से मोह का निवारण ही मोक्ष है। मोक्ष प्रसाद या परम्परा से मिलने वाली वस्तु नहीं वह श्रम के द्वारा प्राप्त होने वाला उपहार है मोक्ष प्रार्थना के साथ प्रत्यन से प्राप्त होता है। पूजा के साथ पुरूषार्थ प्राप्त होता है। हर धर्म सम्प्रदाय मोह और मद के निवारण पर बल देना है। और उसे ही आत्मा की सर्वोच्च स्थिति मानते है। 
 साध्वी सौम्यागुणाश्री जी ने वाणी और शब्दों के प्रभाव पर चर्चा करते हुए कहा कि हर शब्द का अपना विशिष्ट अर्थ एंव प्रभाव होता है। यही शब्द संवाद औा विवाद को जन्म देते है। हद्वय से हद्वय की मुलाकात ही संवाद है और बुद्वी की तकरार विवाद है। संवाद में कोई हारता नहीं और विवाद में कभी कोई जितता नहीं है मात्र संघर्ष ही बढ.ता है। पदार्थ जगत को क्षणिकता,अनित्यता का चितंन हमें व्यर्थ विवादों से बचा सकता है। 
       इस सृष्टि में व्याप्त वायुमंडल की तंरगें के साथ जब मनो तंरगे मिलती है तब कर्म परमाणुओं को तरगों की उत्पति होती है। हमारे मन के शुभ या अशुभ विचार उन तरंगों को शुभ एंव अशुभ बनाते है। मन की इन्ही तरंगों को शुभ,शुद्व एंव स्थिर बनाने के लिए शाश्वत नवपद की आराधना आराधना भवन के पावन प्रांगण में चल रही है। इस आराधना भवन का लक्ष्य संसारिक सुख साधन अथवा साम्रगी की प्राप्ति नहीं अपितु मन,वचन एंव काया का स्थिरिकरण है यही स्थिरीकरण आत्मा को शैलेशीकरण की ओर ले जाता है आत्मा को मौन की अवस्था में ले जाता है। 
       जब तक मौन ना हो तो तब तक शब्दों का सही एंव सिमित प्रयोग अंत्यत आवश्यक है क्योंकि हर शब्द प्रागवान और मूल्यवान होता है। भारत में प्रचलित विविध रागों में भी शब्दों का विशेष महत्व होता है,वह रागे विशेष स्थितियों को उत्पन्न भी करती है। जैसे मालकोश राग कठोर मन को निर्मल बनाती है। दीपक राग बिना तेल और माचिस के दीपक जलाती है। तो मल्हार राग बिना बादल के बारीश ले आती है यह सब शब्दों का वाणी का ही प्रभाव है। नवपद आराधना से अनुभूत होने वाली मन एंव वाणी की स्थिरता मात्र नवपद दरबार तक सिमित न रहकर हमारे आचरण में व्याप्त हो,हमारे दैनिक व्यवहार का अंग बने इसी नवपद जाप की दरबार की सार्थकता है। 
खरतरगच्छ संघ के कोषाध्यक्ष गौतमचन्द डंूगरवाल  ने बताया कि तपस्वी रत्न शान्तिलाल जी गोलेच्छा चेन्नई, रणजीतमल जी गोलेच्छा फलोदी,व केसरीचन्द जी गोलेच्छा जयपुर से पधारे।  उनका  खरतरगच्छ संघ द्वारा बहुमान किया गया। एंवम तपस्वी रत्न शान्तिलाल जी गोलेच्छा चेन्नई, द्वारा संघ प्रभावना की गई।

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